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पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश हो सकते हैं गिरफ्तार

कन्नौज अपहरण काण्ड का मामला 

राजनीतिक दर्शन पर दर्जनों पुस्तकों के लेखक, राजनीति सुधारक और वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल के मुखिया श्री भरत गांधी के पांच साल के संघर्ष के बाद पूर्व मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव, उनके सहयोगियों, डीजीपी कार्यालय के उच्चस्थ अधिकारियों पर लगे अपहरण, प्रताड़ना, गैग रेप के झूठे मुकदमों की साजिश रचने जैसे आरोपों पर सीबीसीआईडी से जांच करने करने के लिये उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव गृह को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपने गत आदेश दिनांक- 24 फरवरी, 2016 को निर्देश दिया था। चूंकि केस में मुख्यमंत्री मुख्य आरोपी थे, इसलिये उन्होने आयोग के निर्देश का अनुपालन नही होने दिया। अपने आदेश का अनुपालन न किये जाने पर क्षुब्ध होकर आयोग ने अपने आदेश दिनांक-19.04.2017 द्वारा केस को मानवाधिकार योग की फुल बेंच को भेज दिया है. आयोग ने प्रमुख सचिव गृह को पुनः आदेश जारी करके पेटिशनर श्री भरत गांधी को पुलिस सुरक्षा देने और आरोपों पर सीबीसीआईडी से जांच करने करने के आदेश जारी किये है.

श्री गांधी के याचिका दिनांक 11 नवम्बर सन् 2013 पर दर्ज केस संख्या- 40582/24/48/2013 पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपने आदेश दिनांक- 24 फरवरी, 2016 में कहा था कि उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव गृह लगातार हो रहे जानलेवा हमलों के शिकार याचिकाकर्ता श्री भरत गांधी को पुलिस सुरक्षा दें व आपराधिक घटनाओं की जांच सीबीसीआईडी से कराके रिपोर्ट 6 सप्ताह के अंदर आयोग को सौंपें और श्री भरत गांधी के विविध प्रत्यावेदनों में अंकित शिकायतों की जांच प्रदेश की जांच एजेंसी सीबीसीआईडी से करवा के रिपोर्ट 6 सप्ताह के अंदर आयोग के विचारार्थ प्रस्तुत करें। उत्तर प्रदेश राज्य की सीबीसीआईडी ने आयोग को अपने पत्र दिनांक- 09 सिंतम्बर, 2016 के माध्यम से सूचित किया कि उसे जांच करने के लिये आयोग से और केन्द्रीय गृह मंत्रालय से आदेश प्राप्त हुआ है। इन आदेशों के अनुपालनार्थ प्रदेश की जांच एजेन्सी ने प्रमुख सचिव(गृह) को चार बार पत्र भेजकर जांच करने की अनुमति मांगी है। सीबीसीआईडी ने आयोग को आगे की जानकारी देते हुये कहा है कि प्रदेश सरकार से जांच की अनुमति न मिल पाने के कारण नियमानुसार जांच एजेंसी जांच शुरू नहीं कर सकी है। इस बीच प्रदेश में सपा की सरकार चली गयी और बीजेपी की सरकार बन गयी. नई सरकार ने आयोग के आदेश दिनांक २४ फरवरी २०१६ के अनुपालन में 4 अप्रैल २०१६ को शासनादेश जारी कर के कन्नौज अपहरण काण्ड की जाच करने के लिए सीबी सीआईडी को अनुमति जारी कर दिया और याचिकाकर्ता श्री भरत गाँधी को पुलिश सुरक्षा देने के लिए गृह विभाग के अनुभाग दो को आदेशित कर दिया. इस आदेश को आयोग की वेबसाइट www.nhrc.nic.in के होम पेज केश नंबर डायल करके देख सकते हैं। श्री गांधी से संपर्क करने के लिये फोन- 096 96 1 2 3 4 5 6 पर बात भी किया जा सकता है। हिन्दी क्रुतिदेव व यूनीकोड में प्रस्तुत विस्तृत जानकारी के लिये डाउनलोड करें, इस ईमेल का अटैचमेंट। पढ़िये पूरी कहानी……..

अपराध के जरिये राजनीति का रास्ता नही छोड़ा है अखिलेश यादव ने। मीडिया में बनी उनकी छवि झूठ साबित हुई है। भारत की राजनीति एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जिसमें यह तय होना है कि राजनीति और अपराध अलग हो पायेंगे या नही? आम आदमी के नाम पर बनी पार्टी को लेकर जिस तरह का उत्साह मीडिया में व जनता में देखा गया, उससे लगा था कि शायद भ्रष्टाचार व अपराध से अब भारत की राजनीति का दामन छूट जायेगा। किन्तु ऐसा होता नही दिख रहा है। इस पार्टी के ज्यादातर विधायकों पर आपराधिक मुकदमें कायम हो चुके हैं।

अपराध को संरक्षण देने के लिये देश में जिस नेता को सबसे ज्यादा बदनामी मिली, वह हैं- उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव। जब उन्होने अपने पुत्र अखिलेश यादव को सत्ता की बागडोर सौंपी, तो बहुत से लोगों को लगा कि विदेश में पढ़ा-लिखा ये युवक अपने पिता के रास्ते पर न चल कर उ. प्र. को एक ताजी व शीतल राजनीति देगा। मीडिया द्वारा ऐसी छवि खासकरके उस समय बनायी भी गई जब उनका मुकाबला अपने चाचा श्री शिवपाल यादव से हुआ। मीडिया ने समाचारों को इकतरफा इस प्रकार से पेश किया जिससे यह भ्रम बना कि समाजवादी पार्टी को अखिलेश यादव अपराध से मुक्त करना चाहते हैं और उनके चाचा श्री शिववपाल यादव अपराधियों के संरक्षक बने रहना चाहते हैं।

किन्तु जून 2012 में सम्पन्न हुये कन्नौज उपचुनाव को जिस तरीके से मुलायम सिंह की पुत्रवधू डिम्पल यादव ने जीता, उससे अखिलेश यादव की ओर आस लगाये बैठे लोगों की उम्मीदों पर पानी फिर गया है। कन्नौज की यह अपराध गाथा वैसे तो समाचार पत्रों में कभी-कभी राष्ट्रीय खबर बनती रही है और राजनीति के आपराधीकरण का एक नया आयाम पेश करती है। प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के संरक्षण में चल रही अपराध गाथा पर सारी मीडिया मौन रही है, शायद उसलिये कि वह मुख्यमंत्रा के पद पर विराजमान रहे थे। इस रपट में कन्नौज अपहरण काण्ड की पूरी कहानी इसलिये दी जा रही है कि जिससे सुधी पाठक यह जान सकें कि देश में राजनीति के आपराधीकरण के लिये वास्तव में जिम्मेदार कौन है?

कानूनी व संवैधानिक सुधारों पर दर्जनों पुस्तकों के लेखक और वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल के प्रमुख श्री भरत गांधी कहते हैं कि उन्हांने उक्त उपचुनाव 2012 के 6 साल पहले से अमेठी, रायबरेली व कन्नौज जैसे वीआईपी लोगों के चुनाव क्षेत्रों को काम करने के लिये चुना। उनका कहना है कि इन क्षेत्रों को इसलिये चुना गया क्योंकि यहां से देश के बड़े दलों का नेतृत्व करने वाले लोग चुनाव लड़ते हैं। श्री गांधी का आकलन था कि इन क्षेत्रों की जनता को समझाने का मतलब होता है, बड़ी पार्टियों के प्रमुखों की सोच में बदलाव लाना। उनका यह भी निष्कर्ष था कि बड़ी पार्टियों के प्रमुखों की सोच में बदलाव का मतलब होता है देश की राजनीतिक चेतना में बदलाव। श्री भरत गांधी और उनके साथियों को उम्मीद थी कि जल-जंगल-जमीन जैसे प्राकृतिक साधनों व मशीन के कारण पैदा हुये साझे धन में देश के वोटरों को हिस्सा दिलाने वाला संसद में 137 सांसदों द्वारा पेश वोटरशिप का जो प्रस्ताव कानून का दर्जा नहीं ले पाया, उसे शायद देश के ‘‘वी. आई. पी. क्षेत्रों’’ की जनता को समझाने से कानून का दर्जा मिल जाये।

जब संसद में वोटरशिप का प्रस्ताव आने से बलात् रोक दिया गया, तो राजनीति सुधारने के वोटरशिप सहित तमाम एजेण्डों पर काम करने के लिये उस समय एक नई राजनीतिक पार्टी का गठन किया गया। इस पार्टी का नाम रखा गया- वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल(वीपीआई)। इस पार्टी के बैनर तले अमेठी व रायबरेली में बड़े पैमाने पर जनता का ध्रुवीकरण हुआ। वहां कोई विशेष घटना नहीं घटी। किन्तु अखिलेश यादव के क्षेत्र कन्नौज में काम करना इतना आसान साबित नहीं हुआ।

हुआ यह कि वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल, वीपीआई ने संसद में पेश राजनीतिक सुधारों की योजना की ओर लोगों का ध्यान खींचने के उद्देश्य से कन्नौज लोकसभा के उप चुनाव 2012 में अपना प्रत्याशी खड़ा करने का फैसला किया। इस फैसले से पहले वह कहते हैं कि सभी बड़े दलों से संपर्क किया गया व उनसे उप चुनाव में प्रत्याशी न उतारने का आग्रह किया गया। उनका दावा है कि उनकी बातों पर कांग्रेस, बी. जे. पी. व बसपा जैसे दलों ने कन्नौज उप चुनाव में प्रत्यशी  न उतारने का आग्रह मान लिया। परिणामस्वरूप चुनाव केवल समाजवादी पार्टी व वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल के बीच हो गया। चुनाव की घोषणा होते ही सपा हरकत में आ गई और चुनाव लड़ने के लिये कन्नैज कलेक्ट्रेट जाने वाले सभी लगभग 83 लोगों का बन्दूक की नोक पर अपहरण कर लिया गया और चुनाव नही होने दिया गया। मीडिया में ये पूरी कहानी नही आई। केवल यह खबर आई कि ‘‘मुख्यमंत्री की पत्नी डिम्पल यादव कन्नौज से निर्विरोध सांसद बन गईं, उनके खिलाफ किसी ने पर्चा ही नही भरा’’।

वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल के अलावा अपहरण का शिकार किसी भी पार्टी व प्रत्यासी ने इस जुर्म के खिलाफ आवाज नही उठाई। किन्तु इस नयी पार्टी ने हिम्मत दिखाते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय में डिम्पल के चुनाव के खिलाफ चुनाव याचिका दायर करके चुनाव की वैधता को चुनौती दी। न्यायालय ने लगभग चार महीने तक बड़ी सक्रियता दिखाई। किन्तु जब डिम्पल यादव काफी मशक्कत के बाद न्यायालय में पेश हुई, तो हर सप्ताह सुनवाई में चल रही केस की अचानक सुनवाई लगभग डेढ़ साल तक के लिये बंद हो गई। इस अवधि में डिम्पल यादव का संसदीय कार्यकाल पूरा हो गया और लोकसभा के गत वर्ष हुये चुनाव में फिर से जीता हुआ घोषित कर दिया गया। राजनीति की सफाई के लिये काम कर रहे श्री भरत गांधी कहते हैं की इस बार वास्तव में चुनाव मोदी लहर में भाजपा के प्रत्यासी श्री सुब्रत पाठक ने जीत लिया था। किन्तु मतगणना रोक कर अचानक निर्वाचन अधिकारी ने चमत्कारिक ढ़ग से डिम्पल यादव को विजयी घोषित कर दिया। कथित रूप से विजयी घोषित होने के बाद हाई कोर्ट इलाहाबाद ने डिम्पल यादव के खिलाफ पेश चुनाव याचिका की अचानक फिर से सुनवाई शुरू कर दी और 23 जुलाई 2012 को दाखिल वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल की चुनाव याचिका संख्या 19/2012 को तकनीकी आधार पर बिना ट्रायल के दिनांक 03.09.2014 को खारिज कर दिया। हांलाकि खारिज करते वक्त भी अपहरण की घटना को उच्च न्ययालय ने नहीं नकारा।

चुनाव रोकने के लिये किये गये सामूहिक अपहरण काण्ड की जानकारी चुनाव आयोग को 6 जून 2012 को ही दे दी गयी थी। आयोग ने अपहरण अभियान की संरक्षिका कन्नौज के तत्कालीन कलेक्टर से रपट मांगी। कलेक्टर यानी निर्वाचन अधिकारी सिल्वा कुमारी जे. ने लिखकर भेजा कि ‘‘कलेक्टेट के आसपास के दुकानदारों से अपहरण के बारे में पूंछा गया तो उन्होने बताया कि अपहरण नही हुआ’’। चुनाव आयोग ने आरोपी से रपट मांगा व उसकी रपट को स्वीकार करके निष्पक्ष जांच की जरूरत नही समझा। इससे इस बात की प्रबल संभावना है ि कइस अपहरण काण्ड को अंजाम देने के लिये केवल जिलाधिकारी, प्रदेश निर्वाचन अधिकारी को ही विष्वास में नलहीं लियो गया था भारत के निर्वाचन आयोग को भी ‘‘साधा’’ गया था। आयोग अकादमिक स्तर पर राजनीति का अपराधीकरण राकने के तमाम कसीदे पढ़ता है, लेकिन जब अपराधियों पर कार्यवाही करने का मौका आता है तो इसी तरह का बर्ताव करता है, जैसा उपरोक्त कहानी में बताया गया। इस पूरी परिघटना में चुनाव आयोग की भूमिका की जांच करें तो इस निष्कर्ष को नकारा नही जा सकता है कि ‘‘चुनाव मे प्रत्यासियों का अपहरण करके चुनाव को बलात् निर्विरोध घोषित करवाने में चुनाव आयोग को विष्वास में लिया गया था’’।

सामूहिक अपहरण काण्ड के जरिये मुख्यमंत्री ने अपनी पत्नी को संसद भवन के अंदर पंहुचाकर ‘‘माननीय सांसद’’ बना दिया। अजीब बात है कि जहां राष्ट्रपति का चुनाव भी निर्विरोध नही होता वहां सांसद का चुनाव निविरोध हो गया। रिष्वत लेकर प्रचारित मीडिया की इस झूठी खबर पर लोगों ने आसानी से यकीन कर लिया। सामूहिक अपहरण काण्ड की पूरी जानकारी केन्द्रीय गृह मंत्री श्री सुशील कुमार सिंदे को दिया गया। भारत सरकार के गृह सचिव को लगभग एक दर्जन पत्र भेजकर अपहरणकर्ताओं के खिलाफ भेजी गई शिकायत दिनांक 21 जून 2012 पर प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की गई। गृह सचिव ने कार्यवाही करने की बजाय ‘‘कानून व्यवस्था राज्य का मामला है’’-इस तर्क पर सभी प्रत्यावेदनों को उत्तर प्रदेश के उसी गृह सचिव भेज दिया, जो अपहरण के मुख्य आरोपी तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव के अधीन काम करता था। इस तरह देश व प्रदेश के गृह सचिवों को भेजे गये सभी प्रत्यावेदन सामूहिक अपहरण काण्ड के आरोपी मुख्यमंत्री की टेबल पर कार्यवाही करने के लिये पंहुच गये। जिनपर गत गत पांच सालों में कुछ नही हुआ। सूचना के अधिकार से की गई कार्यवाही की मांग करने वाले कृष्णानन्द शास्त्री को पिस्तौल से डरा के चुप करा दिया गया।

वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल के संस्थापक व पार्टी के ‘नीति निर्देशक’ श्री भरत गांधी को व मुक्ष्यमंत्रा की पत्नी श्रीमती िउम्पल यादव के सामने उतारे गये इस पार्टी के प्रत्यासी श्री प्रभात पाण्डेय को जब धमकिया मिलने लगीं, तो भरत गांधी ने सुप्रीम कोर्ट. में मुकदमा दायर करके पुलिस सुरक्षा दिये जाने की मांग की। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई को दो बार स्थगित किया गया। तीसरी बार सुनवाई हुई तो न्यायाधीश चंद्रमौली कुमार प्रसाद की बेंच ने श्री भरत गांधी के तर्कों को सुना। न्यायालय ने श्री भरत गांधी द्वारा सीबीआई जांच के लिये दी गई दलीलों को नहीं माना। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने प्रत्यक्ष प्रमाण को भी नजरंदाज किया। देश के सबसे बड़े न्यायालय के इस फैसले को अपराधियों ने अपराध करने का सर्वोच्च न्यायालय से मिला लाइसेंस माना।

केन्द्र व राज्य के गृह सचिवों की चुप्पी पर सर्वोच्च न्यायालय ने चुप्पी साध लिया। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले दिनांक-22 जनवरी 2013 में लिखा कि -‘‘कोर्ट क्रिमिनल रिट में की गई प्रार्थना से सहमत नही है। जहां तक याचिकाकर्ताओं की सुरक्षा की बात है कोर्ट याचिकाकर्ता को सलाह देती है कि वे नये सिरे से उ.प्र. के पुलिस महानिदेशक के कार्यालय में सुरक्षा के लिये प्रत्यावेदन लगायें। पुलिस महानिदेशक खतरे की जांच करके नियमानुसार सुरक्षा देगे। किन्तु इसका यह मतलब नही समझा जाना चाहिये कि कोर्ट याचिकाकर्ताओं को सुरक्षा देने का आदेश दे रही है।’’

सुप्रीम कोर्ट अपहरणकर्ताओं के खिलाफ किसी भी तरह की जांच करने व एफ. आई. आर. दर्ज करने के सवाल पर चुप्पी साध गया। परिणामस्वरूप अपराधियों के मनोबल बढ़ गये व अपराधों की लड़ी लग गई। सुप्रीम कोर्ट के आदेश की भाषा का फायदा उठाते हुये तत्कालीन पुलिस महानिदेशक श्री देवराज नागर ने आदेश को गंभीरता से न लेते हुये जांच के नाम पर लीपा-पोती कर दी और मुख्यमंत्री के इर्द-गिर्द के गुण्डों से घिरे याचिकाकर्ताओं को सुलिस सुरक्षा देने से मना कर दिया। इस प्रकार श्री अखिलेश यादव ने उच्चस्थ अधिकारियों के सहयोग से सुप्रीम कार्ट के आदेश को भी धता बता दिया।

हाई कोर्ट इलाहाबाद व सुप्रीम कोर्ट के उक्त इस आदेशों से समाज में ये संदेश गया कि ‘‘राजनीति में अपराध के जरिये चुनाव जीत लेना व संसद सदस्य बन जाना एक साधारण बात है। राजनीतिक अपराधियों को सजा दिलाने में कोर्ट का कीमती समय बर्बाद करना उचित नही है। राजनीतिक अपराधियों को सजा दिलाने का काम करने वाले लोगों की सुरक्षा भी बहुत कीमती चीज नही है। सत्तासीन मुख्यमंत्रीगण को अपराध को संरक्षण देने का अघोषित अधिकार है।’’ हाई कोर्ट इलाहाबाद व सुप्रीम कोर्ट के उक्त इस आदेशों से लोगों की ये धारणा भी मजबूत हुई कि ‘‘समरथ को नहि दोष गोसाईं’’, ‘‘ताकतवर लोगों का कुछ नही बिगड़ता भाई!’’, ‘‘अदालतें सफेद हाथी हैं। इनके वश का कुछ भी नही है’’। ‘‘अदालतें केवल कुछ लोगों को रोजगार देने का जरिया भर हैं’’।

यह आशंका निराधार नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट. के आदेश पर भरत गांधी व उनकी पार्टी के प्रत्यासी को पुलिस सुरक्षा देने पर डीजीपी देव राज नागर ने नियमानुसार जांच नहीं की और सुरक्षा देने से मना कर दिया। जब सूचना के अधिकर के तहत जांच की रपट मांगी गई तो सूचना देने से मना कर दिया। जब पुलिस महानिदेशक के विरुद्ध राज्य सूचना आयेग में अपील की गई तो के आयोग के चेयरमैन जावेद उस्मानी ने दिनांक-25 जून 2015 के आदेश के सहारे डीजीपी को सूचना देने से छूट देकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को निरर्थक बना दिया। तब तक इतनी देर हो चुकी थी कि पुलिस महानिदेशक डीजीपी देव राज नागर रिटायर्ड हो गये और उनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट अवमानना का मुकदमा भी दायर नही किया जा सकता था।

तुम डाल-डाल, तो हम पात-पात-इस तरीके से काम कर रहे वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल के लोगों ने भी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का पीछा नहीं छोड़ा। अब पार्टी ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में प्रत्यावेदन दिनांक-11.11.2013 लगाया। आयोग ने मामले में संज्ञान ले लिया और भारत सरकार के गृह सचिव को, उ. प्र. तथा असम प्रदेश के पुलिस महानिदेशकों को नोटिस जारी कर दिया। असम के पुलिस महानिदेशक ने बोड़ो आतंकवादियों के खतरे के मद्देनजर भरत गांधी को असम प्रवास के दौरान 24 घंटे पुलिस स्कार्ट देने की बात अपने पत्र दिनांक- 11.06.2015 द्वारा स्वीकार कर लिया।

श्री भरत गांधी की केस में पारित राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आदेश दिनांक-3 मार्च 2015 पर डीजीपी. ने उ. प्र. के आरोपी मुख्यमंत्री के करीबी व इटावा के उप पुलिस अधीक्षक रह चुके िऋषिपाल यादव को जांच अधिकारी नियुक्त कर दिया। इस जांच अधिकारी ने जांच करने की बजाय आरोपी के आपराधिक सहयोगी की तरह जांच के नाम पर लीपापोती किया। यहां तक कि जबरदस्ती गवाही लेने के लिये हथियारबंद अपराधियों को लेकर गवाहों के घर पंहुच गया।

िऋषिपाल यादव को जांच अधिकारी नियुक्त होने के बाद व इस जांच अधिकारी के समक्ष गवाही देने के बाद शिकायतकर्ता प्रभात पाण्डेय का 27 अप्रैल को अमेठी से अपहरण हो गया। बंदूक की नोक पर सैकडों सादे पेपरों पर दस्तखत करवा लिये गये। अपहरणकर्ताओं का पता लगाने के लिये श्री भरत गांधी ने प्रदेश के मुख्य सचिव को 5 मई 2015 को प्रत्यावेदन देकर सीबीआई जांच या न्यायिक आयोग के गठन की मांग किया। मुख्य सचिव आलोक रंजन ने प्रदेश के गृह सविच को कार्यवाही का आदेश देते हुये मामला गृह सचिव देबाशीष पाण्डा के पास भेज दिया।

गत 20 मई 2015 को भरत गांधी ने प्रदेश के राज्यपाल राम नाइक से मिलकर पूरा वाकया बताया और सरकार से मामले में रपट मांगने की प्रार्थना किया। राज्यपाल की ओर से कोई कार्यवाही हुई या नही, इस विषय में राज भवन ने कोई जानकारी नही दिया। राज्यपाल राम नाइक जी की दवि ये है ि क वह गलत बात बर्दास्त नही करते। फिर भी राज्यपाल की चुप्पी यह बताती है कि राजव्यवस्था पूरी तरह सड़ गल चुकी है।

अपने लोकप्रिय प्रवचनों द्वारा कई हजार लोगं को राजनीतिक सुधार का प्रखर प्रवक्ता बना चुके श्री भरत गांधी कहते है कि कानूनी कार्यवाही का सामना करते-करते जब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव आजिज आ गये तो उन्होंने भरत गांधी का अपहरण करने के लिये टाटा सफारी व फार्चूनर गाड़ियों में अपराधियों को उनके लखनऊ निवास पर 4 जुलाई 2015 दोपहर 1 बजे भेजा। दिल्ली में होने के कारण भरत गांधी उनके हत्थे चढ़ने से बच गये। इस घटना पर पुलिस महानिदेशक के पास लिखित शिकायत की गई। पुलिस ने मुकदमा दर्ज नही किया। इसके बाद श्री गांधी ने प्रदेश के मुख्य सचिव को दिनांक 08 जुलाई 2015 को प्रत्यावेदन भेजकर अपने खिलाफ भेजे गये अपराधियों को पकड़ने व मुकदमा चलाने के लिये सी. बी. आई. तैनात करेन की मांग किया। प्रत्यावेदन की प्रतियों को कार्यवाही करने के लिये भारत सरकार के गृह सचिव, उ. प्र. के राज्यपाल और पुलिस महानिदेशक व दिल्ली के पुलिस कमिष्नर को भी भेजा गया। अपराधियों को पकड़ने की तो बात ही छोड़िये, कोई भी अधिकारी प्राथमिकी दर्ज करने की हिम्मत भी नही जुटा पाया।

इसका परिणाम यह हुआ कि अपराधियों का मनोबल और बढ़ गया। दो गाड़ियों में भरकर आये अपराधियों ने 31 जनवरी 2016 की रात में उस समय श्री भरत गांधी पर फिर से हमला किया, जब श्री भरत गांधी कन्नौज में आयोजित जनसभा को संबोधित करके अपनी कार से लखनऊ जा रहे थे। तमाम प्रत्यावेदनों के वावजूद फिर से आपराधियों के खिलाफ मुकदमा तक नही लिखा गया। भारत सरकार के मुख्य सचिव, उ. प्र. के राज्यपाल और पुलिस महानिदेशक सभी ने चुप्पी साध ली।

राजनीति शास्त्रा पर समकालीन चिंतक श्री भरत गांधी का कहना है कि चष्मदीद लोगों की नजरों के सामने कन्नौज में लगभग प्रदेश भर से बुलाकर 800 सशस्त्र अपराधियों को मुख्यमंत्री की पत्नी के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले लोगों का अपहरण करने के लिये लगाया गया था। सबने मोबाइल पर आपसे मे बात की थी। भरत गांधी ने अपहरणकर्ताओं के मास्टर माइण्ड नवाब सिंह यादव का मोबाइल नम्बर देते हुये तीन साल तक लगातार मांग किया कि कॉल रिकार्ड देखकर सभी 800 अपहर्ताओ को पकड़ा जाये। किन्तु आज तक किसी एजेन्सी ने काल रिकार्ड की परीक्षा नहीं की।

उ. प्र. के 800 अपराधियों को कौन बचा रहा है? क्या केन्द्र में सत्तासीन भाजपा सरकार सी बी. आई. लगाकर अपराधियों का जखीरा प्रदेश से उखाड़ नही सकती? आखिर सी बी. आई. लगाने की श्री भरत गांधी की बात को नकार के क्या केन्द्र की भाजपा सरकार प्रदेश की सपा सरकार के अपराधियों की सुरक्षा नहीं कर रही है? यदि ऐसा ही है तो क्या भाजपा चाहती है कि सपा का जंगलराज चलता रहे और जंगलराज का नाम लेकर भाजपा लोगों से हर पांच साल में जनता से वोट मांगती रहे।

मुख्यमंत्री पर अपराधों की साजिश रचने व अपराधियों को संरक्षण देने का जो आरोप लगा है, उस पर पुलिस थाने तो छोड़िये, स्वयं पुलिस महानिदेशक ने भी चुप्पी साध रखी है। अब तो आरोप स्वयं पुलिस महानिदेशक पर लगने लगे हैं। क्योंकि मानवाधिकर आयोग अपने आदेश दिनांक- 16.10.2015 द्वारा मांगे जाने पर भी पुलिस महानिदेशक ने श्री भरत गांधी की सुरक्षा पर तैयार किये गये जांच रपट को आयोग के अवलोकनार्थ नही भेजा और दो साल से छिपा कर रखा है। श्री भरत गांधी के लखनऊ आवास पर हमला करने वाली कार का नम्बर देने के बाद भी पुलिस महानिदेशक ने इस कार के मालिक का ब्योरा आयोग को नही भेजा। इसके विपरीत डिजिटल रजिस्टर से इस कार का पंजीकरण ही मिटा दिया गया। अमेठी के एडवोकेट प्रभात पाण्डेय व उनके लिये पैरबी करने वाले उनके पड़ोसी श्री लालजी वर्मा के खिलाफ रेप का झूठा मुकदमा पुलिस महानिदेशक और अखिलेश सरकार के मंत्री श्री गायत्री प्रजापति जो अब जेल में हैं, के निर्देष पर ही लिखवाया गया है।

पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव श्री भरत गांधी को जीवित छोड़ने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहते थे। उन्हांने श्री भरत गांधी का अपहरण व हत्या करने के इरादे से दो गाड़ियों में भरकर अपने पालतू अपराधियों को 7 जुलाई, 2015 को श्री भरत गांधी के लखनउ निवास पर भेजा। इस मामले में पुलिस में षिकायत दर्ज कराई गई, किन्तु मुकदमा नही लिखने दिया गया। इसके बाद 15 नवम्बर, 2016 को जब किसी तरह पता चला कि श्री भरत गांधी इस समय लखनउ में मौजूद हैं तो पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उनको उनके निवास से दोबारा अपहरण या हत्या का प्रयास करवाया। इस बार अपराधियों ने देखा कि मकान की छत पर बैठा कोई व्यक्ति कैमरे से संदिग्ध लोगों की गतिविधियों की रिकार्डिंग कर रहा है, खतरे को भांप कर अपराधी वापस चले गये।

मजेदार बात तो ये है कि उक्त सारी बातें श्री भरत गांधी ने अपनी बहस के दौरान सुप्रीम कोर्ट को गत 22 फरवरी, 2016 को अपनी दूसरी बहस के दौरान बताया और न्यायालय से केन्द्रीय बलों की सुरक्षा देने की मांग की। न्यायालय जो अक्सर राजनीति के अपराधीकरण पर टिप्पड़ियां करता रहता है, ने कहा कि तीन साल पुरानी याचिका पर फिर से अदालत कोई आदेश जारी नही कर सकती।

जब गवाहो के अपहरण, उनको डराने धमकाने व बंदूक की नोक पर बयान लेने श्री भरत गांधी की कार पर हमला करने की घटनाओं को माननीय राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के संज्ञान में लाया गया तो आयोग ने गत 24 फरवरी 2016 को दूसरा आदेश देते हुये श्री भरत गांधी के जीवन पर समाजवादी पार्टी के गुण्डों से खतरा महसूस किया और प्रमुख सचिव गृह श्री देवाशीश पाण्डा को आदेश देते हुये कहा कि शिकायतकर्ता श्री भरत गांधी को और लखनऊ में रह रहे उनके परिवारजन को पुलिस सुरक्षा दिया जाये साथ ही साथ अब मामले की जांच सी. आई. डी. से कराके आयोग को 6 सप्ताह के भीतर रिपोर्ट सौंपा जाये। जांच के लिये श्री भरत गांधी ने गवाहो के लिखित बयानों सहित आपराधिक घटनाओं का बिंदुवार ब्योरा अपने आवेदन दिनांक- 12 मार्च, 2016 और 11 अप्रैल, 2016 के आवेदनों के माध्यम से उत्तर प्रदेश की सी. आई. डी. को भेजा। किन्तु एक बार फिर कोई कार्यवाही नही होने दी गई।

अप्रैल, 2016 के बाद भेजे गये अपने आवेदनों के माध्यम से श्री भरत गांधी ने मानीय मानवाधिकार आयोग को बताया कि प्रदेश की अखिलेश सरकार ने आयोग के आदेश का उसी तरह उल्लंघन कर दिया है जिस तरह अखिलेश सरकार ने माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन सन् 2013 में किया था। श्री भरत गांधी की बातों को सही बताते हुये सी. आई. डी. उत्तर प्रदेश ने आयोग को भेजे गए अपने 9 सितम्बर, 2016 के पत्र में कहा है कि माननीय राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जांच करने संबंधी आदेश सी. आई. डी. को प्राप्त हुए हैं और प्रदेश के प्रमुख सचिव गृह से जांच करने की अनुमति चार बार मांगी गई किंतु जांच की अनुमति सरकार ने नहीं दी।

श्री भरत गांधी और सी. आई. डी. उत्तर प्रदेश के पत्रों पर संज्ञान लेते हुये माननीय आयोग ने अपने नए आदेश अप्रैल, 2017 में प्रदेश के प्रमुख गृह सचिव श्री देवाशीश पांडा को सम्मन भेजा है। अब गृह सचिव को श्री भरत गांधी की केस में पारित गत आदेश 24 फरवरी 2016 का अनुपालन करने के तहत श्री भरत गांधी को पुलिस सुरक्षा मुहैया कराना होगा; सी. आई. डी. को जांच करने की अनुमति देनी होगी और जांच की रिपोर्ट 6 सप्ताह के भीतर आयोग को भेजना होगा। यदि गृह सचिव फिर से अखिलेश यादव और उनके आपराधिक गिरोह को बचाने की कोशिश करते हैं और आयोग के आदेश का अनुपालन करने में हीलाहवाली करते हैं तो आयोग की प्रक्रिया के तहत आयोग अपने अगले आदेश में प्रदेश के प्रमुख सचिव गृह को गिरफ्तार करके आयोग के समक्ष पेश करने के लिए वारंट जारी करेगा।

किन्तु वारंट की नौबत आती हुई नही दिख रही है क्योंकि अब प्रदेश में सरकार बदल चुकी है। नये मुख्यमंत्री प्रदेश में अपराधियों की सफाई का अभियान चला रहे हैं। वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल (वीपीआई) के मुखिया श्री भरत गांधी के केस में पारित माननीय राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का आदेश मुख्यमंत्री के अपराध निवारण के काम में सहयोगी ही साबित होगा, क्योंकि इससे समाजवादी पार्टी के प्रदेश भर के लगभग 800 अपराधियों के पकडे़ जाने की संभावना है।

श्री अखिलेश यादव पर यह मुकदमा जाने-माने राजनीति सुधारक व दर्जनों पुस्तकों के लेखक व वोटर्स पार्टी इंटरनेशनल के मुखिया श्री भरत गांधी ने राजनीति से अपराध खत्म करने की अपनी मुहिम के तहत दायर किया है। इसके पहले उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में भी मुकदमा किया है उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में इसी मामले में दो बार बहस भी कर चुके हैं। आयोग के गत आदेश दिनांक- 24.02.2016 और इसी के अनुपालन के लिये जारी ताजा आदेश 05.04.2017 की संलग्न। प्रति विस्तृत जानकारी- अवजमतेचंतजलण्पदधंददंनरापकदंचांदक

सवाल उठता है कि आखिर उच्च स्तरीय लोगों के अपराधों पर कानून की सारी मषीनरी हैंग क्यों हो जाती है? इसकी वजह क्या है? इसके लिये जिम्मेदार कौन है? क्या हाई कोर्ट, जिसने चस्मदीद गवाहों को अदालत तक पंहुंचने नही दिया और चुनाव याचिका रद्द कर दी? क्या सुप्रीम कोर्ट, जिसने बिना कारण बताये सी. बी. आई. जांच कराने से मना कर दिया और राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिये संघर्षरत श्री भरत गांधी को पुलिस सुरक्षा देने के बारे में जानबूझ कर लचर भाषा का इस्तेमाल किया, जिससे पुलिस महानिदेशक उस भाषा का दुरुपयोग करके भरत गांधी पर जान के खतरे का भय बनाये रख सकें? क्या संघीय गृह मंत्रालय के अधिकारी, जिन्होने रामदेव, शीजलवाड़, संगीत सोम, पप्पू यादव को तो सुरक्षा दे दिया, लेकिन श्री भरत गांधी के मामले को बार-बार उत्तर प्रदेश के उसी दफ्तर में भेजा, जिनकी वजह से श्री गांधी की जान को खतरा पैदा हुआ? क्या उत्तर प्रदेश के मुख्य सूचना आयुक्त श्री जावेद उस्मानी, जिन्होंने अपना फैसला देते वक्त पुलिस महानिदेशक के उस गैर कानूनी आदेश पर चुप्पी साध लिया जिसमें श्री भरत गांधी को पुलिस महानिदेशक ने उनकी अपनी सुरक्षा पर किये गये जांच रिपोर्ट को देने से मना कर दिया था।

उच्च स्तरीय लोगों के अपराधों पर कानून की सारी मषीनरी हैंग क्यों हो जाती है व राजनीति के क्षेत्र का अपराध रुकता क्यों नही? आखिर इसके लिये जिम्मेदार कौन है? क्या अपराध की सीढ़ी पर चढ़कर सत्ता के षिखर पर विराजमान नेता, जो पालतू अपराधियों द्वारा अपराध करवाते हैं, पुलिस महानिदेशक से उन अपराधियों को संरक्षण दिलवाते हैं और राजनीतिक अपराधियों के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने वालों के खिलाफ झूठे मुकदमें लिखवाकर उन्हें जेल भेजवाते है? क्या भारत का चुनाव आयेग, जो सब कुछ जानते हुये भी मुख्यमंत्री की पत्नी श्रीमती डिम्पल यादव को अपराध के सहारे निर्विरोध सांसद बनने का केवल मौका ही नहीं दिया, अपितु कन्नौज से निर्विरोध चुनाव जीतने का झूठा प्रमाणपत्र देने वाले जिला अधिकारी का बचाव भी करता रहा। क्या कानून, जो पुलिस को प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री के अधीन रखते हैं?

कन्नौज अपहरण काण्ड और उसके खिलाफ लड़ी गई कानूनी जंग से साफ पता चलता है कि राजनीति के अपराध के लिये केवल नेता जिम्मेदार नही हैं। देश-प्रदेश के गृह मंत्रालयों के आई. ए. एस. व आई. पी. एस. अधिकारी, प्रदेशों के पुलिय महानिदेशकों के कार्यालय, चुनाव आयोग, हाई कोर्ट व सुप्रीम कोर्ट भी उतने ही जिम्मेदार हैं। इससे आगे बढ़कर अपनी जान हथेली पर लेकर अपराध के खिलाफ संघर्ष कर रहे श्री भरत गांधी राजनीति के अपराधीकरण के लिये उक्त संस्थाओं के अलावा जनप्रतिनिधित्व कानून व लोकतंत्र की वर्तमान परिभाषा को भी जिम्म्ेदार मानते हैं और अपराध के खिलाफ एक बड़ी मुहिम छेड़ने की जरूरत बताते हैं। उनका यह भी कहना है कि चूंकि मीडिया की नई तकनीकि आ जाने के कारण किसी भी तरह की मुहिम अब केवल कारपोरेट संचालित मीडिया ही चला सकती है। अतः यदि अपराध के खिलाफ देश में कोई मुहिम नहीं चल रही है तो इसका सीधा सा अर्थ है कि देश विदेश के कारपोरेट घराने राजनीति के अपराधीकरण को अपनी आमदनी का जरिया समझते हैं।

फिलहॉल, संवैधानिक एजेन्सियों द्वारा की जा रही अपहर्ताओं की सुरक्षा से संदेश. जाता है कि राजनीति का अपराधी सुरक्षित है। राजनीति केवल अपराधियों के लिये है। जो अपराध नही कर सकता, वह चुनाव लड़ नही सकता। चुनाव में दूसरी पार्टियों के अपराधियों का सामना किसी भी पार्टी का सज्जन कार्यकर्ता नहीं कर सकता है? इसलिये पार्टियों के सामने अपराधियों को ही टिकट देने के सिवा कोई विकल्प नही है। इस परिस्थिति को तभी बदला जा सकता है जब राजनीति के अपराधीरिण के खिलाफ केवल बोला ही न जाय, अपितु कुछ किया भी जाये। कम से कम श्री भरत गांधी जैसे लोग कुछ कर रहे हैं तो उनका हर संभव सहयोग किया जाये। चुप्पी केवल भरत गांधी के लिये ही नही, सबके लिये घातक है।

रिपोर्टर- जयपाल जेहरा, पीयूसीएल, दिल्ली,

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