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कन्नौज अपहरण कांड पर की गयी कानूनी कार्यवाही का घटनाक्रम.

भरत गांधी

प्रमुख/नीति निर्देशक

वोटर्स पार्टी इंटरनेशनल ने पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव के कन्नौज संसदीय क्षेत्र से उपचुनाव में अपना प्रत्याशी खड़ा किया था। जिसका 6 जून 2012 को अपहरण हुआ। साथ में दो और लोगों का अपहरण हुआ। सादेश यादव और राम सिंह लोधी। यह दोनों क्रमशः मैनपुरी और औरैया जिले के थे। डेढ़ महीने बाद 23 जुलाई 2012 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में श्रीमती डिंपल यादव के चुनाव पर चुनाव याचिका दाखिल करके आपत्ति दर्ज की गई। हाईकोर्ट में न पेश होने के कारण जब एक तरफा फैसला सुनाने का आदेश उच्च न्यायालय ने दिया, तब डिंपल यादव अपने वकील के माध्यम से पेश हुई और वकील वही व्यक्ति था गजेंद्र सिंह, जो मुख्यमंत्री का पी आर ओ था और पूरे अपहरण कांड का मास्टरमाइंड था। इसके बाद प्रत्याशी को और पार्टी के मुखिया श्री भरत गांधी को जान से मारने की धमकियां मिलने लगीं .
VPI के प्रमुख श्री भरत गांधी ने माननीय सुप्रीम कोर्ट में रिट पिटीशन दाखिल करके कन्नौज अपहरण कांड में स्वयं बहस किया और माननीय सुप्रीम कोर्ट से सीबीआई जांच की मांग की और खुद अपने लिए और प्रत्याशी के लिए पुलिस सुरक्षा के नाम की। सुप्रीम कोर्ट ने 21 जनवरी 2013 को आदेश देते हुए सीबीआई जांच से मना कर दिया किंतु भरत गांधी और उनकी पार्टी के प्रत्याशी को पुलिस सुरक्षा देने के लिए उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को आदेशित कर दिया। माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अनुपालन अखिलेश सरकार ने 5 साल तक नहीं होने दिया। सुप्रीम कोर्ट से न्याय ना मिलता हुआ देखकर श्री भरत गांधी ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में 11 नवंबर 2013 को पिटीशन दाखिल कर अपने लिए सुरक्षा मांगा। साथ ही सीबीआई की जांच भी मागा। मानवाधिकार आयोग ने कई आदेश जारी किए। अंत में 2 मार्च 2015 को उत्तर प्रदेश पुलिस की समस्त जांच रिपोर्ट को रद्द करते हुए पुलिस महानिदेशक को आदेश का दिया कि वह अपने स्तर पर जांच कराकर रिपोर्ट भेजें। आयोग के आदेश मिलने पर कानपुर देहात के ASP  ऋषि पाल सिंह यादव जांच अधिकारी बनाए गए. जिन्होंने जांच कम किया, अपराध ज्यादा। उन्होंने अभियुक्तों और अपराधियों को लेकर जबरदस्ती गवाहों के घर पर छापा मारकर मनमर्जी बयान देने के लिए विवश किया।  पार्टी के प्रत्याशी प्रभात पांडे को उसके घर से 27 अप्रैल 2015 को दोबारा अपहरण कर लिया गया। असहनीय यातनाएं दी गईं सैकड़ों सादे पन्नों पर हस्ताक्षर करा लिया गया अपनी मनमर्जी का जबरदस्ती बयान लिखवा लिया गया, समाजवादी पार्टी में जबरदस्ती भर्ती कर लिया गया। गायत्री प्रजापति के माध्यम से उसके ऊपर बलात्कार का मुकदमा दर्ज कर लिया गया। इस मुकदमे में भरत गांधी को फसाने की कोशिश की गई।  प्रभात पांडेय टूट गया और उनके साथ हो जाने के लिए विवश हो गया। किंतु फोन रिकॉर्ड हो जाने के नाते श्री भरत गांधी ने आयोग को सीडी सौंप दिया। आयोग ने अगला आदेश 16 अक्टूबर 2016 को किया और आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर की गई कार्यवाही की रिपोर्ट मांगा। किंतु पुलिस महानिदेशक को यह रिपोर्ट भेजने से अखिलेश यादव सरकार ने रोक दिया। इस बीच भरत गांधी के लखनऊ निवास पर 4 जुलाई 2015 को हथियारबंद लोगों ने हमला कर दिया किंतु भरत गांधी दिल्ली में थे, इसलिए बच गए। हमले की जानकारी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को दी गई। मानवाधिकार आयोग ने 24 फरवरी 2016 को आदेश देते हुए उत्तर प्रदेश के गृह सचिव देवाशीष पांडा को कहा कि वह पूरे मामले में सीबीसीआईडी से जांच कराएं और भरत गांधी और उनके परिवार को सुरक्षा मुहैया कराएं और 6 सप्ताह के अंदर रिपोर्ट सबमिट करें। किंतु अखिलेश सरकार ने सीबीसीआईडी को जांच करने की अनुमति नहीं दी। सीबीसीआईडी ने 8 सितंबर 2016 को श्री भरत गांधी को पत्र भेजते हुए बताया कि मेरी एजेंसी को जांच करने की अनुमति शासन से नहीं मिल रही है, 4 बार प्रयास किया गया। यह जानकारी श्री भरत गांधी ने मानवाधिकार आयोग को सौंप दिया। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सामने एक ही रास्ता था कि उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव गृह श्री देबाशीष पांडा को गिरफ्तारी वारंट जारी करके गिरफ्तार करके दिल्ली बुलाया जाये। लेकिन तब तक सरकार बदल गई और चार अप्रैल 2017 को योगी सरकार की तरफ से शासनादेश जारी कर दिया गया और सीबीसीआईडी को जाने की अनुमति दे दी गई। 15 दिन बाद 19 अप्रैल को गृह सचिव की ओर से नया आदेश जारी करते हुए श्री भरत गांधी को पुलिस सुरक्षा देने का आदेश दे दिया गया, जो सुरक्षा अभी तक नहीं मिली है। क्योंकि खुफिया विभाग में अभी भी अखिलेश के लगाए हुए अधिकारी और कर्मचारी काम कर रहे हैं जो बार बार सुरक्षा जांच के नाम पर झूठी रिपोर्ट सरकार को भेज रहे हैं।