Press Release

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पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उनके लगभग 800 पालतू आपराधियों के अपराधों की जांच करने के लिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 24 फरवरी 2016 को आदेश दिया था। लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री के दबाव में पूरे 1 साल से उत्तर प्रदेश के गृह सचिव देवाशीष पांडा ने फाइल दबा के रखे हुई थी। जैसे ही योगी सरकार बनी,  वैसे ही आयोग के आदेश का अनुपालन शुरू हो गया। मामले में याचिकाकर्ता व वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल के प्रमुख श्री भरत गांधी को प्रदेश के गृह सचिव ने पत्र भेजकर यह जानकारी दिया है कि कन्नौज अपहरण कांड के प्रकरण में और आपके ऊपर कराए गए हमलों के प्रकरण में सीबी सीआईडी से जांच कराने के लिए शासनादेश जारी किया गया है और आप की सुरक्षा के लिए गृह विभाग के सेक्शन 2 को आदेशित कर दिया गया है।  समाजवादी रास्ते पर चलने वाली वोटर्स पार्टी इंटरनेशनल  का जनाधार न बढ़ने पाए, इसके लिए पूरे 5 साल तक अखिलेश यादव ने पार्टी के पदाधिकारियों के खिलाफ संगीन आपराधिक साजिश रची, लोगों का अपहरण करवाया, गायत्री प्रजापति के सहारे गैंगरेप के झूठे मुकदमे दायर करवाए, श्री भरत गांधी पर जानलेवा हमले कराया। लेकिन उनके जुल्म की शिकार पार्टी ने भी हार नहीं मानी और उनके हर जुर्म पर वीपीआई ने अखिलेश यादव पर कानूनी शिकंजा कसना जारी रखा।  अपने कार्यकाल के पुलिस महानिदेशकों और गृह सचिव का दुरुपयोग करके अखिलेश यादव ने किसी भी अदालती आदेश को 5 साल तक लागू नहीं होने दिया।  योगी सरकार आते ही गृह मंत्रालय में  धूल खा रहे इन आदेशों का अनुपालन शुरू हो गया है। अभी देखना है के गृह सचिव देवाशीष पांडा को, अखिलेश के जंगल राज के अवकाश प्राप्त पुलिस महानिदेशकों को, स्वयं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को और कन्नौज लखनऊ, अमेठी व कानपुर देहात के पुलिस अधीक्षकों को CID बचाती है, या जेल भेजती है। यह देखना होगा कि हम मामला सीआईडी के स्तर पर निपटता है, या सीबीआई के स्तर तक जाता है। सीबीआई ने श्री भरत गांधी को पत्र भेजकर संवैधानिक अदालत के आदेशों की मांग की है। प्रभावशाली अपराधियों को अगर सीआईडी ने बचाने का प्रयास किया और गृह सचिव ने उचित पुलिस सुरक्षा मंजूर न किया तो यह मामला हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट तक जाएगा ही। देखिए उत्तर प्रदेश सरकार के गृह सचिव का पत्र। 24 फरवरी, 2016 के आदेश द्वारा आयोग ने कन्नौज अपहरण काण्ड की और याचिकाकर्ता भरत गांधी व उनके गवाहों पर हमले की घटनाओं की जांच सी. आई. डी. से कराने और श्री गांधी को पुलिस सुरक्षा मंजूर करने का आदेश दिया था। इन आपराधिक वारदातों में पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव स्वयं और पूरे प्रदेश के उनके आपराधिक साथी 800 लोग आरोपी है। मुख्यमंत्री स्वयं आरोपी होने के कारण गृह सचिव और पुलिस महानिदेशक ने आयोग के आदेश का अनुपालन करने से मना कर दिया।  अपनी पत्नी डिम्पल यादव को निर्विरोध सांसद बनाने के लिये किये गये कन्नौज अपहरण काण्ड में फंसे अखिलेश यादव के मामले  सी. आई. डी. को निष्पक्ष जांच होती है तो अखिलेश के लिये जेल से बच पाना मुश्किल हो जायेगा। यद्यपि मुख्यमंत्रियों के बिरादरी से होने के नाते अखिलेश के गुनाहों पर वर्तमान मुख्यमंत्री उसी तरह पर्दा डाल सकते हैं, जैसे  मायावती ने मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के गुनाहों पर डाला और अखिलेश यादव ने मायावती के गुनाहों पर डाल डाल कर जेल से बचाया था।हालांकि राजनीति के जानकार यह मानते हैं कि मुख्यमंत्री योगी उस मिट्टी के नहीं बने हैं जिस मिट्टी से उनसे पूर्ववर्ती मुख्यमंत्री बने थे। उन्होंने प्रदेश से अपराध खत्म करने का बीड़ा उठाया है। उसमें राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का यह आदेश मील का पत्थर साबित होगा, जिसमें अखिलेश यादव और उनके लगभग 800 आपराधियों का गिरोह जेल जा सकता है। आरोप है कि इन सभी 800 लोगों को अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री रहते हुए अपहरण के काम पर लगा रखा था और इन सभी ने कन्नौज में दिनदहाड़े 100 से ज्यादा लोगों का अपहरण करके मुख्यमंत्री की पत्नी को निर्विरोध सांसद बनाया था। अपहरण के आरोपियों में अखिलेश यादव के अलावा मुख्यमंत्री रहते हुये उनके पीआरओ, उनके सांसद प्रतिनिधि और उनके कई मंत्री भी शामिल थे।वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल (वीपीआई) के मुखिया भरत गांधी द्वारा 11 नवम्बर, सन् 2013 में की गई शिकायत पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने केस नंबर 40582/24/48/2013 दर्ज किया था। इस मामले में आयोग ने 2 मार्च, 2015 के अपने आदेश से प्रदेश के पुलिस महानिदेशक से मामले में जांच करने को कहा था। किन्तु शिकायतकर्ता के अनुसार तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा लगाये गये अपराधियों और पुलिस महानिदेशक कार्यालय के कुछ अधिकारियों ने श्री गांधी के केस के मुख्य गवाह अमेठी के अधिवक्ता प्रभात पाण्डेय का उनके घर से दूसरी बार अपहरण कर बंदूक की नोक पर मनमाफिक बयान लिखवा लिया और तत्कालीन मंत्री गायत्री प्रजापति के माध्यम से वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल के प्रत्यासी श्री पाण्डेय को जबरदस्ती समाजवादी पार्टी का पदाधिकारी बना दिया गया। मुंह बंद रखने के लिये अमेठी के थाने में 9 जुलाई, 2015 को श्री पाण्डेय पर बलात्कार का झूठा मुकदमा लिखवा दिया। किन्तु संयोगवश फोन पर की गई प्रभात पाण्डेय की बातचीत रिकार्ड हो गई और वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल के मुखिया श्री  गांधी ने ऑडियो फाइल सुनने के लिये आयोग को भेज दिया। इसके बाद आयोग ने गत 24 फरवरी 2016 को दूसरा आदेश देते हुये भरत गांधी के जीवन पर समाजवादी पार्टी के गुण्डों से खतरा महसूस किया और प्रमुख सचिव गृह देवाशीष पाण्डा को आदेश देते हुये कहा कि शिकायतकर्ता श्री गांधी को और लखनऊ में रह रहे उनके परिवारजन को पुलिस सुरक्षा दिया जाये, साथ ही साथ अब मामले की जांच सी. बी. सी. आई. डी. से कराकर आयोग को 6 सप्ताह के भीतर रिपोर्ट सौंपा जाये। शिकार्यतकर्ता ने आयोग को यह भी बताया है कि इस बीच शिकार्यतकर्ता यानी वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल (वीपीआई) के मुखिया श्री भरत गांधी पर तीन बार जानलेवा हमला करवाया गया और एक बार भी लखनऊ के जानकीपुरम विस्तार थाने में मुकदमा नही लिखने दिया गया।अपने आवेदनों के माध्यम से श्री भरत गांधी ने आयोग को बताया कि प्रदेश सरकार ने आयोग के आदेश का उसी तरह उल्लंघन कर दिया है जिस तरह सरकार ने माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन सन् 2013 में किया था। श्री भरत गांधी की बातों को सही साबित करते हुये सी. आई. डी. उत्तर प्रदेश ने आयोग को भेजे गए अपने 9 सितम्बर, 2016 के पत्र में कहा है कि माननीय राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जांच करने संबंधी आदेश सी. आई. डी. को प्राप्त हुए हैं और प्रदेश के प्रमुख सचिव गृह से जांच करने की अनुमति चार बार मांगी गई किंतु जांच की अनुमति सरकार ने नहीं दी।  इसके पहले श्री गांधी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में भी मुकदमा किया है, वह सुप्रीम कोर्ट में इसी मामले में दो बार बहस भी कर चुके हैं।

अखिलेश के सामने जेल का संकट, योगी के सामने धर्म संकट

        राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के नए आदेश ने पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को जेल भेजने का रास्ता खोल दिया है। इसके साथ ही वर्तमान मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ के सामने यह धर्म संकट खड़ा हो गया है कि वह अखिलेश यादव को जेल भेजें या मुख्यमंत्री बिरादरी का सदस्य होने के नाते उन पर रहम करें। कन्नौज अपहरण काण्ड में फंसे अखिलेश यादव के मामले की श्री योगी सी. आई. डी. को निष्पक्ष जांच करने देते हैं, तो अखिलेश के लिये जेल से बचना मुश्किल हो जायेगा। यदि योगी जी सीआईडी के काम में पूर्व मुख्यमंत्रियों की तरह दखल देते हैं, तो अखिलेश को जेल जाने से बचा सकते हैं। मुख्यमंत्रियों की बिरादरी से होने के नाते अखिलेश के गुनाहों पर वर्तमान मुख्यमंत्री उसी तरह पर्दा डाल सकते हैं, जैसे मायावती ने मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के गुनाहों पर डाला और अखिलेश यादव ने मायावती के गुनाहों पर डाल कर जेल से बचाया था।

भाजपा व बसपा की अब तक नीति यही रही कि सपा के गुण्डे सुरक्षित रहें व जनता पर जुल्म ढ़ायें, जिससे हम जुल्म के खिलाफ वोट मांगे। हालांकि नये मुख्यमंत्री के निकट के लोग यह मानते हैं कि मुख्यमंत्री योगी जी उस मिट्टी के नहीं बने हैं, जिस मिट्टी से उनसे पूर्ववर्ती मुख्यमंत्री बने थे। उन्होंने प्रदेश से अपराध खत्म करने का बीड़ा उठाया है। उसमें राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का यह आदेश मील का पत्थर साबित होगा, जिसमें अखिलेश यादव और उनके लगभग 800 लोगों का आपराधिक गिरोह जेल जा सकता है। आरोप है कि इन सभी 800 लोगों को श्री अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री रहते हुए अपहरण के काम पर लगा रखा था और इन सभी ने कन्नौज में दिनदहाड़े 100 से ज्यादा लोगों का अपहरण करके मुख्यमंत्री की पत्नी को निर्विरोध सांसद बनाया था। सभी तो चुप बैठ गये लेकिन वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल के कार्यकर्ताओं का अपहरण अखिलेश यादव को मंहगा पड़ा। अपहरण के आरोपियों में अखिलेश यादव के अलावा मुख्यमंत्री रहते हुये उनके पीआरओ, उनके सांसद प्रतिनिधि और उनके कई मंत्री भी शामिल हैं।

वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल (वीपीआई) के मुखिया श्री भरत गांधी द्वारा सन् 2013 में की गई शिकायत पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने केस नंबर 40582/24/48/2013 दर्ज किया था। आयोग ने 2 मार्च, 2015 के अपने आदेश से प्रदेश के पुलिस महानिदेशक से मामले में जांच करने को कहा था। किन्तु शिकायतकर्ता के अनुसार तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव द्वारा लगाये गये अपराधियों और पुलिस महानिदेशक कार्यालय के कुछ अधिकारियों ने श्री गांधी की केस के मुख्य गवाह अमेठी के अधिवक्ता श्री प्रभात पाण्डेय का उनके घर से दूसरी बार अपहरण कर बंदूक की नोक पर मनमाफिक बयान लिखवा लिया और तत्कालीन मंत्री श्री गायत्री प्रजापति के माध्यम से वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल के उक्त प्रभात पाण्डेय को जबरदस्ती समाजवादी पार्टी का पदाधिकारी बना दिया गया। अमेठी के थाने में 9 जुलाई, 2015 को श्री पाण्डेय पर बलात्कार का झूठा मुकदमा लिखवा दिया गया। किन्तु संयोगवश फोन पर की गई प्रभात पाण्डेय की बातचीत रिकार्ड हो गई और वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल के मुखिया श्री भरत गांधी ने ऑडियो फाइल सुनने के लिये आयोग को भेज दिया। इसके बाद आयोग ने गत 24 फरवरी 2016 को दूसरा आदेश देते हुये श्री भरत गांधी के जीवन पर समाजवादी पार्टी के गुण्डों से खतरा महसूस किया और प्रमुख सचिव गृह श्री देवाशीष पाण्डा को आदेश देते हुये कहा कि शिकायतकर्ता श्री भरत गांधी को और लखनऊ में रह रहे उनके परिवारजन को पुलिस सुरक्षा दिया जाये साथ ही साथ अब मामले की जांच सी. आई. डी. से कराके आयोग को 6 सप्ताह के भीतर रिपोर्ट सौंपी जाये। शिकार्यतकर्ता ने आयोग को यह भी बताया है कि इस बीच शिकार्यतकर्ता यानी वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल (वीपीआई) के मुखिया श्री भरत गांधी पर तीन बार जानलेवा हमला करवाया गया और एक बार भी लखनऊ के जानकीपुरम विस्तार थाने में मुकदमा नही लिखने दिया गया।

अपने आवेदनों के माध्यम से श्री भरत गांधी ने आयोग को बताया कि प्रदेश सरकार ने आयोग के आदेश का उसी तरह उल्लंघन कर दिया है जिस तरह सरकार ने माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन सन् 2013 में किया था। श्री भरत गांधी की बातों को सही बताते हुये सी. आई. डी. उत्तर प्रदेश ने आयोग को भेजे गए अपने 9 सितम्बर, 2016 के पत्र में कहा है कि माननीय राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जांच करने संबंधी आदेश सी. आई. डी. को प्राप्त हुए हैं और प्रदेश के प्रमुख सचिव गृह से जांच करने की अनुमति चार बार मांगी गई किंतु जांच की अनुमति सरकार ने नहीं दी। श्री भरत गांधी और सी. आई. डी. उत्तर प्रदेश के पत्रों पर संज्ञान लेते हुये माननीय आयोग ने अपने नए आदेश दिनांक- 30 मार्च, 2017 में प्रदेश के प्रमुख गृह सचिव श्री देवाशीष पांडा को सम्मन भेजा है। अब गृह सचिव को श्री भरत गांधी के केस में पारित गत आदेश 24 फरवरी 2016 का अनुपालन करने के तहत श्री भरत गांधी को पुलिस सुरक्षा मुहैया कराना होगा। सी. आई. डी. को जांच करने की अनुमति देनी होगी और जांच की रिपोर्ट 6 सप्ताह के भीतर आयोग को भेजनी होगी। यदि गृह सचिव फिर से अखिलेश यादव और उनके आपराधिक गिरोह को बचाने की कोशिश करते हैं और आयोग के आदेश का अनुपालन करने में हीलाहवाली करते हैं तो आयोग की प्रक्रिया के तहत आयोग अपने अगले आदेश में प्रदेश के प्रमुख सचिव गृह को गिरफ्तार करके आयोग के समक्ष पेश करने के लिए वारंट जारी करेगा। किन्तु वारंट की नौबत आती हुई नही दिख रही है क्योंकि अब प्रदेश में सरकार बदल चुकी है। नये मुख्यमंत्री प्रदेश में अपराधियों की सफाई का अभियान चला रहे हैं। वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल (वीपीआई) के मुखिया श्री भरत गांधी के केस में पारित माननीय राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का आदेश मुख्यमंत्री के अपराध निवारण के काम में सहयोगी ही साबित होगा, क्योंकि इससे समाजवादी पार्टी के प्रदेश भर के लगभग 800 अपराधियों के पकडे़ जाने की संभावना है।

श्री अखिलेश यादव पर यह मुकदमा जाने-माने राजनीति सुधारक व दर्जनों पुस्तकों के लेखक व वोटर्स पार्टी इंटरनेशनल के मुखिया श्री भरत गांधी ने राजनीति से अपराध खत्म करने की अपनी मुहिम के तहत दायर किया है। इसके पहले उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में भी मुकदमा किया है। वे सुप्रीम कोर्ट में इसी मामले में दो बार बहस भी कर चुके हैं।

वोटर्स पार्टी इंटरनेशनल, उत्तर प्रदेश !

एजेंसी ने रिकॉर्ड किया वीपीआई प्रमुख भरत गांधी का बयान

उ. प्र. प्रदेश सरकार की मंजूरी मिलते ही कन्नौज अपहरण कांड में सीबीसीआईडी ने जांच शुरु कर दी है। सी.बी. सी.आई.डी. ने सबसे पहले याचिकाकर्ता और वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल (वीपीआई) प्रमुख भरत गांधी का बयान जानकीपुरम विस्तार लखनऊ में उनके आवास पर रिकॉर्ड किया। अपने बयान में भरत गांधी ने बताया कि कन्नौज अपहरण कांड की पूरी साजिश पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा अपनी पत्नी को कन्नौज लोकसभा क्षेत्र से निर्विरोध सांसद बनाने के लिए द्वारा रची गई थी, क्योंकि फिरोजाबाद में राजबब्बर से हारने के बाद अखिलेश यादव फिर से कोई जोखिम नही लेना चाहते थे। वीपीआई प्रमुख ने बताया कि उनकी पार्टी के प्रभात पांडे,  सादेश यादव और राम सिंह लोधी का उस समय अपहरण कर लिया गया, जब प्रभात पाण्डे कन्नौज लोकसभा क्षेत्र उपचुनाव के लिए वीपीआई के प्रत्याशी के तौर पर अपना नामांकन पत्र दाखिल करने जा हे थे।

याचिकाकर्ता भरत गांधी ने बताया कि शहर की पुलिस अपहरणकर्ताओं की खुलेआम मदद कर रही थी। तत्कालीन जिलाधिकारी सिल्वा कुमारी जे. पूरे अपहरण कांड की संरक्षिका थीं और चुनाव आयोग के  बजाय अखिलेश यादव के प्रतिनिधि के तौर पर काम कर रही थीं। श्री गांधी ने सीबी सीआईडी को बताया है कि अपहरण करने के लिए सभी अपराधियों को सफेद कुर्ते-पायजामे और सफेद पैंट-शर्ट में लगाया गया था। शायद ऐसा इसलिए किया गया था कि उनको पहचानना मुश्किल हो। अपहरण के लिए ललकारने वाले लोग अलग थे, जो नामांकन करने वाले लोगों को दबोच कर उनके नामांकन पत्रों को फाड़ कर टुकड़े-टुकड़े कर देते थे और हवा में उड़ा दिया दिया करते थे। इसके बाद बारी आती थी स्थानीय पुलिस अधिकारियों और कोतवाल की, जो नामांकन करने वालों और उनके प्रस्तावकों को मारते-पीटते और धकियाते हुए कन्नौज कलेक्ट्रेट परिसर में खड़ी उन चमचमाती गाड़ियों में धकेल देते थे, जिन पर समाजवादी पार्टी का झण्डा लगा रहता था। गाड़ी में पहले से बैठे हुए अपराधी अपनी पिस्तौल अपहरण का शिकार लोगों की कनपटी पर लगाकर गाड़ी की सीट के नीचे दुबककर बैठ जाने के लिए विवश करते थे। इसके बाद अपहरण के शिकार लोगों की आंखों पर गमछा बांध दिया जाता था, जिससे वह किसी व्यक्ति को या किसी जगह को पहचान न सकें। फिर गाड़ी का ड्राइवर अपहरण के शिकार लोगों को किसी कोल्ड स्टोर में ले जाता था, जहां पर उनके आंखों पर बंधे गमछे को खोल दिया जाता था और पानी पिलाया जाता था। इसके बाद आंखों पर पट्टियां दोबारा बांधकर किसी अज्ञात स्थान पर ले जाया जाता था, जहां सैकड़ों लोगों को अपहृत करके सप्ताह भर से रखा गया था। 06 जून 2012 को नामांकन पत्र भरने की अंतिम तिथि थी। उस दिन शाम को अपहरण के शिकार सभी लोगों को सुदूर जंगलों में ले जाकर छोड़ दिया गया। यद्यपि यह जांच का विषय है कि कुछ लोगों की हत्या की गयी, या नहीं।

राजनीतिक सुधार के लिए भरत गांधी का प्रस्ताव लगभग सभी पार्टियों के 137 सांसदों ने संसद में पेश किया था। राज्य सभा की स्टैंडिंग कमेटी ने सन 2011 में भरत गांधी की कुछ बातें लागू करने की सिफारिश भी की थी। इसके बावजूद भी जब कानून नहीं बना, तो श्री गांधी के देशव्यापी समर्थकों ने वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल का गठन किया। यह पार्टी राजनीति से अपराध दूर करने और राजनीती सुधार के एजेंडे पर कार्य कर रही है। इसलिए पार्टी ने अपहरण काण्ड के शिकार कुछ लोगों से सम्पर्क किया और संयुक्त रूप से कानूनी कार्यवाही करने की मांग की। किन्तु अपहरण के शिकार लोग अपहरण के दौरान दी गयी यातनाओं से इतने भयभीत थे कि किसी ने भी इस आपराधिक वारदात के विरुद्ध पुलिस या अदालत में आवाज उठाने की हिम्मत नहीं की। अन्त में यह कानूनी लड़ाई वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल को अकेले ही लड़नी पड़ी। यहां तक कि पार्टी के जिन लोगों को कानूनी कार्यवाही करने के लिए अधिकृत किया गया, अखिलेश यादव ने अपने हथियारबंद अपराधियों को उनके घरों पर भेजकर डराया और धमकाया और कानूनी कार्यवाही से हाथ खींच लेने के लिए विवश कर दिया। इसलिए कानूनी कार्यवाही का सारा जिम्मा भरत गांधी को खुद अपने हाथ में लेना पड़ा। इसीलिए श्री गांधी ने कन्नौज अपहरण कांड को लेकर 22 जनवरी 2013 को सुप्रीम कोर्ट में स्वयं बहस की और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में सारी कानूनी कार्यवाही स्वयं अपने नाम से की। हालांकि इसके लिए उनके ऊपर अखिलेश यादव ने 3 बार जानलेवा हमला कराया किन्तु संयोगवश तीनों बार वह सुरक्षित रहे। इन हमलों के बारे में भी सीबी सीआईडी जांच कर रही है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने कन्नौज अपहरण कांड की जांच सीबीसीआईडी से कराने का आदेश पिछले साल 24 फरवरी 2016 को उ. प्र. सरकार को दिया था। किंतु अखिलेश यादव के दबाव में गृह सचिव देवाशीष पाण्डा ने आयोग के आदेश का पालन नहीं किया। यह जानकारी सीबीसीआईडी ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को और याचिकाकर्ता भरत गांधी को 8 सितम्बर, 2016 के पत्र के माध्यम से उस समय दी, जब सूचना के अधिकार के तहत यह जानकारी मांगी गई।

सीबीसीआईडी द्वारा दी गई जानकारी मिलने के बाद आयोग अगला आदेश जारी करने वाला था, किंतु तब तक प्रदेश में सरकार बदल गई। आदित्यनाथ योगी सरकार ने मानवाधिकार आयोग के आदेश के अनुपालन में गत 3 अप्रैल 2017 को शासनादेश जारी करके प्रदेश की सीबीसीआईडी को कन्नौज अपहरण कांड और भरत गांधी के ऊपर किए गए जानलेवा हमलों के मामले में जांच करने की अनुमति दे दी। इस जांच को कराने के लिए सीबीसीआईडी हेडक्वार्टर ने कानपुर के आईजी को अधिकृत किया है। आयोग के निर्देशानुसार भरत गांधी को पुलिस सुरक्षा देने संबंधित कार्यवाही भी प्रदेश के गृह मंत्रालय द्वारा की जा रही है।

भवदीय

सादेश यादव

सचिव प्रदेश कार्य समिति, उ. प्र.

वोटर्स पार्टी इंटरनेशनल

 

 

 

 

अखिलेश हो सकते हैं गिरफ्तार

राजनीतिक दर्शन पर दर्जनों पुस्तकों के लेखक, राजनीति सुधारक और वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल के मुखिया श्री भरत गांधी के पांच साल के संघर्ष के बाद मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव, उनके सहयोगियों, डीजीपी कार्यालय के उच्चस्थ अधिकारियों पर लगे अपहरण, प्रताड़ना, गैग रेप के झूठे मुकदमों आदि की साजिश रचने जैसे आरोपों पर सीबीसीआईडी से जांच करने करने के लिये उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव गृह को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपने गत आदेश दिनांक- 24 फरवरी, 2016 को निर्देश दिया था। चूंकि केस में मुख्यमंत्री मुख्य आरोपी थे इसलिये उन्होने आयोग के निर्देश का अनुपालन नही होने दिया। अपने आदेश का अनुपालन न किये जाने पर क्षुब्ध होकर आयोग ने अपने ताजा आदेश दिनांक-04.03.2017 द्वारा प्रमुख सचिव गृह को सम्मन भेज दिया है। सम्मन में आयोग ने कहा है कि आयोग के गत आदेश दिनांक- 24 फरवरी, 2016 का परिपालन सुनिश्चित करते हुये लगातार हो रहे जानलेवा हमलों के शिकार श्री भरत गांधी को पुलिस सुरक्षा दिया जाये व आपराधिक घटनाओं की जांच सीबीसीआईडी से कराके रिपोर्ट 6 सप्ताह के अंदर आयोग को सौंपी जाये। यदि ऐसा न किया गया तो अपनी प्रकिया के अनुसार आयोग अपने अगले आदेश में उत्तर प्रदेश के गृह सचिव को गिरफ्तार करने का वारंट जारी कर देगा।

सन् 2013 में दर्ज केस संख्या- 40582/24/48/2013 पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपने आदेश दिनांक- 24 फरवरी, 2016 में कहा था कि उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव गृह लगातार हो रहे जानलेवा हमलों के शिकार याचिकाकर्ता श्री भरत गांधी को पुलिस सुरक्षा दिया दें व आपराधिक घटनाओं की जांच सीबीसीआईडी से कराके रिपोर्ट 6 सप्ताह के अंदर आयोग को सौंपें और श्री भरत गांधी के विविध प्रत्यावेदनों में अंकित शिकायतों की जांच प्रदेश की जांच एजेंसी सीबीसीआईडी से करवा के रिपोर्ट 6 सप्ताह के अंदर आयोग के विचारार्थ प्रस्तुत करें। उत्तर प्रदेश राज्य की सीबीसीआईडी ने आयोग को अपने पत्र दिनांक- 09 सिंतम्बर, 2016 के माध्यम से सूचित किया कि उसे जांच करने के लिये आयोग से और केन्द्रीय गृह मंत्रालय से आदेश प्राप्त हुआ है। इन आदेशों के अनुपालनार्थ प्रदेश की जांच एजेन्सी ने प्रमुख सचिव(गृह) को चार बार पत्र भेजकर जांच करने की अनुमति मांगी है। सीबीसीआईडी ने आयोग को आगे की जानकारी देते हुये कहा है कि प्रदेश सरकार से जांच की अनुमति न मिल पाने के कारण नियमानुसार जांच एजेंसी जांच शुरू नहीं कर सकी है। सीबीसीआईडी का पत्र, आयोग के गत आदेश की प्रति, जिस पर आयोग ने ताजा आदेश में गृह सविच को सम्मन जारी किया है, इस रपट के साथ संलग्न है। इस आदेश को आयोग की वेबसाइट www.nhrc.nic.in के होम पेज देख सकते हैं। श्री गांधी से संपर्क करने के लिये फोन- 096 96 1 2 3 4 5 6 पर बात भी किया जा सकता है। हिन्दी क्रुतिदेव व यूनीकोड में प्रस्तुत विस्तृत जानकारी के लिये डाउनलोड करें, इस ईमेल का अटैचमेंट। पढ़िये पूरी कहानी……..

अपराध के जरिये राजनीति का रास्ता नही छोड़ा है अखिलेश यादव ने। मीडिया में बनी उनकी छवि झूठ साबित हुई है। भारत की राजनीति एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जिसमें यह तय होना है कि राजनीति और अपराध अलग हो पायेंगे या नही? आम आदमी के नाम पर बनी पार्टी को लेकर जिस तरह का उत्साह मीडिया में व जनता में देखा गया, उससे लगा था कि शायद भ्रष्टाचार व अपराध से अब भारत की राजनीति का दामन छूट जायेगा। किन्तु ऐसा होता नही दिख रहा है। इस पार्टी के ज्यादातर विधायकों पर आपराधिक मुकदमें कायम हो चुके हैं।

अपराध को संरक्षण देने के लिये देश में जिस नेता को सबसे ज्यादा बदनामी मिली, वह हैं- उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव। जब उन्होने अपने पुत्र अखिलेश यादव को सत्ता की बागडोर सौंपी, तो बहुत से लोगों को लगा कि विदेश में पढ़ा-लिखा ये युवक अपने पिता के रास्ते पर न चल कर उ. प्र. को एक ताजी व शीतल राजनीति देगा। मीडिया द्वारा ऐसी छवि खासकरके उस समय बनायी भी गई जब उनका मुकाबला अपने चाचा श्री शिवपाल यादव से हुआ। मीडिया ने समाचारों को इकतरफा इस प्रकार से पेश किया जिससे यह भ्रम बना कि समाजवादी पार्टी को अखिलेश यादव अपराध से मुक्त करना चाहते हैं और उनके चाचा श्री शिववपाल यादव अपराधियों के संरक्षक बने रहना चाहते हैं।

किन्तु जून 2012 में सम्पन्न हुये कन्नौज उपचुनाव को जिस तरीके से मुलायम सिंह की पुत्रवधू डिम्पल यादव ने जीता, उससे अखिलेश यादव की ओर आस लगाये बैठे लोगों की उम्मीदों पर पानी फिर गया है। कन्नौज की यह अपराध गाथा वैसे तो समाचार पत्रों में कभी-कभी राष्ट्रीय खबर बनती रही है और राजनीति के आपराधीकरण का एक नया आयाम पेश करती है। प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के संरक्षण में चल रही अपराध गाथा पर सारी मीडिया मौन रही है, शायद उसलिये कि वह मुख्यमंत्रा के पद पर विराजमान रहे थे। इस रपट में कन्नौज अपहरण काण्ड की पूरी कहानी इसलिये दी जा रही है कि जिससे सुधी पाठक यह जान सकें कि देश में राजनीति के आपराधीकरण के लिये वास्तव में जिम्मेदार कौन है?

कानूनी व संवैधानिक सुधारों पर दर्जनों पुस्तकों के लेखक और वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल के प्रमुख श्री भरत गांधी कहते हैं कि उन्हांने उक्त उपचुनाव 2012 के 6 साल पहले से अमेठी, रायबरेली व कन्नौज जैसे वीआईपी लोगों के चुनाव क्षेत्रों को काम करने के लिये चुना। उनका कहना है कि इन क्षेत्रों को इसलिये चुना गया क्योंकि यहां से देश के बड़े दलों का नेतृत्व करने वाले लोग चुनाव लड़ते हैं। श्री गांधी का आकलन था कि इन क्षेत्रों की जनता को समझाने का मतलब होता है, बड़ी पार्टियों के प्रमुखों की सोच में बदलाव लाना। उनका यह भी निष्कर्ष था कि बड़ी पार्टियों के प्रमुखों की सोच में बदलाव का मतलब होता है देश की राजनीतिक चेतना में बदलाव। श्री भरत गांधी और उनके साथियों को उम्मीद थी कि जल-जंगल-जमीन जैसे प्राकृतिक साधनों व मशीन के कारण पैदा हुये साझे धन में देश के वोटरों को हिस्सा दिलाने वाला संसद में 137 सांसदों द्वारा पेश वोटरशिप का जो प्रस्ताव कानून का दर्जा नहीं ले पाया, उसे शायद देश के ‘‘वी. आई. पी. क्षेत्रों’’ की जनता को समझाने से कानून का दर्जा मिल जाये।

जब संसद में वोटरशिप का प्रस्ताव आने से बलात् रोक दिया गया, तो राजनीति सुधारने के वोटरशिप सहित तमाम एजेण्डों पर काम करने के लिये उस समय एक नई राजनीतिक पार्टी का गठन किया गया। इस पार्टी का नाम रखा गया- वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल(वीपीआई)। इस पार्टी के बैनर तले अमेठी व रायबरेली में बड़े पैमाने पर जनता का ध्रुवीकरण हुआ। वहां कोई विशेष घटना नहीं घटी। किन्तु अखिलेश यादव के क्षेत्र कन्नौज में काम करना इतना आसान साबित नहीं हुआ।

हुआ यह कि वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल, वीपीआई ने संसद में पेश राजनीतिक सुधारों की योजना की ओर लोगों का ध्यान खींचने के उद्देश्य से कन्नौज लोकसभा के उप चुनाव 2012 में अपना प्रत्याशी खड़ा करने का फैसला किया। इस फैसले से पहले वह कहते हैं कि सभी बड़े दलों से संपर्क किया गया व उनसे उप चुनाव में प्रत्याशी न उतारने का आग्रह किया गया। उनका दावा है कि उनकी बातों पर कांग्रेस, बी. जे. पी. व बसपा जैसे दलों ने कन्नौज उप चुनाव में प्रत्यशी  न उतारने का आग्रह मान लिया। परिणामस्वरूप चुनाव केवल समाजवादी पार्टी व वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल के बीच हो गया। चुनाव की घोषणा होते ही सपा हरकत में आ गई और चुनाव लड़ने के लिये कन्नैज कलेक्ट्रेट जाने वाले सभी लगभग 83 लोगों का बन्दूक की नोक पर अपहरण कर लिया गया और चुनाव नही होने दिया गया। मीडिया में ये पूरी कहानी नही आई। केवल यह खबर आई कि ‘‘मुख्यमंत्री की पत्नी डिम्पल यादव कन्नौज से निर्विरोध सांसद बन गईं, उनके खिलाफ किसी ने पर्चा ही नही भरा’’।

वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल के अलावा अपहरण का शिकार किसी भी पार्टी व प्रत्यासी ने इस जुर्म के खिलाफ आवाज नही उठाई। किन्तु इस नयी पार्टी ने हिम्मत दिखाते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय में डिम्पल के चुनाव के खिलाफ चुनाव याचिका दायर करके चुनाव की वैधता को चुनौती दी। न्यायालय ने लगभग चार महीने तक बड़ी सक्रियता दिखाई। किन्तु जब डिम्पल यादव काफी मशक्कत के बाद न्यायालय में पेश हुई, तो हर सप्ताह सुनवाई में चल रही केस की अचानक सुनवाई लगभग डेढ़ साल तक के लिये बंद हो गई। इस अवधि में डिम्पल यादव का संसदीय कार्यकाल पूरा हो गया और लोकसभा के गत वर्ष हुये चुनाव में फिर से जीता हुआ घोषित कर दिया गया। राजनीति की सफाई के लिये काम कर रहे श्री भरत गांधी कहते हैं की इस बार वास्तव में चुनाव मोदी लहर में भाजपा के प्रत्यासी श्री सुब्रत पाठक ने जीत लिया था। किन्तु मतगणना रोक कर अचानक निर्वाचन अधिकारी ने चमत्कारिक ढ़ग से डिम्पल यादव को विजयी घोषित कर दिया। कथित रूप से विजयी घोषित होने के बाद हाई कोर्ट इलाहाबाद ने डिम्पल यादव के खिलाफ पेश चुनाव याचिका की अचानक फिर से सुनवाई शुरू कर दी और 23 जुलाई 2012 को दाखिल वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल की चुनाव याचिका संख्या 19/2012 को तकनीकी आधार पर बिना ट्रायल के दिनांक 03.09.2014 को खारिज कर दिया। हांलाकि खारिज करते वक्त भी अपहरण की घटना को उच्च न्ययालय ने नहीं नकारा।

चुनाव रोकने के लिये किये गये सामूहिक अपहरण काण्ड की जानकारी चुनाव आयोग को 6 जून 2012 को ही दे दी गयी थी। आयोग ने अपहरण अभियान की संरक्षिका कन्नौज के तत्कालीन कलेक्टर से रपट मांगी। कलेक्टर यानी निर्वाचन अधिकारी सिल्वा कुमारी जे. ने लिखकर भेजा कि ‘‘कलेक्टेट के आसपास के दुकानदारों से अपहरण के बारे में पूंछा गया तो उन्होने बताया कि अपहरण नही हुआ’’। चुनाव आयोग ने आरोपी से रपट मांगा व उसकी रपट को स्वीकार करके निष्पक्ष जांच की जरूरत नही समझा। इससे इस बात की प्रबल संभावना है ि कइस अपहरण काण्ड को अंजाम देने के लिये केवल जिलाधिकारी, प्रदेश निर्वाचन अधिकारी को ही विष्वास में नलहीं लियो गया था भारत के निर्वाचन आयोग को भी ‘‘साधा’’ गया था। आयोग अकादमिक स्तर पर राजनीति का अपराधीकरण राकने के तमाम कसीदे पढ़ता है, लेकिन जब अपराधियों पर कार्यवाही करने का मौका आता है तो इसी तरह का बर्ताव करता है, जैसा उपरोक्त कहानी में बताया गया। इस पूरी परिघटना में चुनाव आयोग की भूमिका की जांच करें तो इस निष्कर्ष को नकारा नही जा सकता है कि ‘‘चुनाव मे प्रत्यासियों का अपहरण करके चुनाव को बलात् निर्विरोध घोषित करवाने में चुनाव आयोग को विष्वास में लिया गया था’’।

सामूहिक अपहरण काण्ड के जरिये मुख्यमंत्री ने अपनी पत्नी को संसद भवन के अंदर पंहुचाकर ‘‘माननीय सांसद’’ बना दिया। अजीब बात है कि जहां राष्ट्रपति का चुनाव भी निर्विरोध नही होता वहां सांसद का चुनाव निविरोध हो गया। रिष्वत लेकर प्रचारित मीडिया की इस झूठी खबर पर लोगों ने आसानी से यकीन कर लिया। सामूहिक अपहरण काण्ड की पूरी जानकारी केन्द्रीय गृह मंत्री श्री सुशील कुमार सिंदे को दिया गया। भारत सरकार के गृह सचिव को लगभग एक दर्जन पत्र भेजकर अपहरणकर्ताओं के खिलाफ भेजी गई शिकायत दिनांक 21 जून 2012 पर प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की गई। गृह सचिव ने कार्यवाही करने की बजाय ‘‘कानून व्यवस्था राज्य का मामला है’’-इस तर्क पर सभी प्रत्यावेदनों को उत्तर प्रदेश के उसी गृह सचिव भेज दिया, जो अपहरण के मुख्य आरोपी तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव के अधीन काम करता था। इस तरह देश व प्रदेश के गृह सचिवों को भेजे गये सभी प्रत्यावेदन सामूहिक अपहरण काण्ड के आरोपी मुख्यमंत्री की टेबल पर कार्यवाही करने के लिये पंहुच गये। जिनपर गत गत पांच सालों में कुछ नही हुआ। सूचना के अधिकार से की गई कार्यवाही की मांग करने वाले कृष्णानन्द शास्त्री को पिस्तौल से डरा के चुप करा दिया गया।

वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल के संस्थापक व पार्टी के ‘नीति निर्देशक’ श्री भरत गांधी को व मुक्ष्यमंत्रा की पत्नी श्रीमती िउम्पल यादव के सामने उतारे गये इस पार्टी के प्रत्यासी श्री प्रभात पाण्डेय को जब धमकिया मिलने लगीं, तो भरत गांधी ने सुप्रीम कोर्ट. में मुकदमा दायर करके पुलिस सुरक्षा दिये जाने की मांग की। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई को दो बार स्थगित किया गया। तीसरी बार सुनवाई हुई तो न्यायाधीश चंद्रमौली कुमार प्रसाद की बेंच ने श्री भरत गांधी के तर्कों को सुना। न्यायालय ने श्री भरत गांधी द्वारा सीबीआई जांच के लिये दी गई दलीलों को नहीं माना। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने प्रत्यक्ष प्रमाण को भी नजरंदाज किया। देश के सबसे बड़े न्यायालय के इस फैसले को अपराधियों ने अपराध करने का सर्वोच्च न्यायालय से मिला लाइसेंस माना।

केन्द्र व राज्य के गृह सचिवों की चुप्पी पर सर्वोच्च न्यायालय ने चुप्पी साध लिया। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले दिनांक-22 जनवरी 2013 में लिखा कि -‘‘कोर्ट क्रिमिनल रिट में की गई प्रार्थना से सहमत नही है। जहां तक याचिकाकर्ताओं की सुरक्षा की बात है कोर्ट याचिकाकर्ता को सलाह देती है कि वे नये सिरे से उ.प्र. के पुलिस महानिदेशक के कार्यालय में सुरक्षा के लिये प्रत्यावेदन लगायें। पुलिस महानिदेशक खतरे की जांच करके नियमानुसार सुरक्षा देगे। किन्तु इसका यह मतलब नही समझा जाना चाहिये कि कोर्ट याचिकाकर्ताओं को सुरक्षा देने का आदेश दे रही है।’’

सुप्रीम कोर्ट अपहरणकर्ताओं के खिलाफ किसी भी तरह की जांच करने व एफ. आई. आर. दर्ज करने के सवाल पर चुप्पी साध गया। परिणामस्वरूप अपराधियों के मनोबल बढ़ गये व अपराधों की लड़ी लग गई। सुप्रीम कोर्ट के आदेश की भाषा का फायदा उठाते हुये तत्कालीन पुलिस महानिदेशक श्री देवराज नागर ने आदेश को गंभीरता से न लेते हुये जांच के नाम पर लीपा-पोती कर दी और मुख्यमंत्री के इर्द-गिर्द के गुण्डों से घिरे याचिकाकर्ताओं को सुलिस सुरक्षा देने से मना कर दिया। इस प्रकार श्री अखिलेश यादव ने उच्चस्थ अधिकारियों के सहयोग से सुप्रीम कार्ट के आदेश को भी धता बता दिया।

हाई कोर्ट इलाहाबाद व सुप्रीम कोर्ट के उक्त इस आदेशों से समाज में ये संदेश गया कि ‘‘राजनीति में अपराध के जरिये चुनाव जीत लेना व संसद सदस्य बन जाना एक साधारण बात है। राजनीतिक अपराधियों को सजा दिलाने में कोर्ट का कीमती समय बर्बाद करना उचित नही है। राजनीतिक अपराधियों को सजा दिलाने का काम करने वाले लोगों की सुरक्षा भी बहुत कीमती चीज नही है। सत्तासीन मुख्यमंत्रीगण को अपराध को संरक्षण देने का अघोषित अधिकार है।’’ हाई कोर्ट इलाहाबाद व सुप्रीम कोर्ट के उक्त इस आदेशों से लोगों की ये धारणा भी मजबूत हुई कि ‘‘समरथ को नहि दोष गोसाईं’’, ‘‘ताकतवर लोगों का कुछ नही बिगड़ता भाई!’’, ‘‘अदालतें सफेद हाथी हैं। इनके वश का कुछ भी नही है’’। ‘‘अदालतें केवल कुछ लोगों को रोजगार देने का जरिया भर हैं’’।

यह आशंका निराधार नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट. के आदेश पर भरत गांधी व उनकी पार्टी के प्रत्यासी को पुलिस सुरक्षा देने पर डीजीपी देव राज नागर ने नियमानुसार जांच नहीं की और सुरक्षा देने से मना कर दिया। जब सूचना के अधिकर के तहत जांच की रपट मांगी गई तो सूचना देने से मना कर दिया। जब पुलिस महानिदेशक के विरुद्ध राज्य सूचना आयेग में अपील की गई तो के आयोग के चेयरमैन जावेद उस्मानी ने दिनांक-25 जून 2015 के आदेश के सहारे डीजीपी को सूचना देने से छूट देकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को निरर्थक बना दिया। तब तक इतनी देर हो चुकी थी कि पुलिस महानिदेशक डीजीपी देव राज नागर रिटायर्ड हो गये और उनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट अवमानना का मुकदमा भी दायर नही किया जा सकता था।

तुम डाल-डाल, तो हम पात-पात-इस तरीके से काम कर रहे वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल के लोगों ने भी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का पीछा नहीं छोड़ा। अब पार्टी ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में प्रत्यावेदन दिनांक-11.11.2013 लगाया। आयोग ने मामले में संज्ञान ले लिया और भारत सरकार के गृह सचिव को, उ. प्र. तथा असम प्रदेश के पुलिस महानिदेशकों को नोटिस जारी कर दिया। असम के पुलिस महानिदेशक ने बोड़ो आतंकवादियों के खतरे के मद्देनजर भरत गांधी को असम प्रवास के दौरान 24 घंटे पुलिस स्कार्ट देने की बात अपने पत्र दिनांक- 11.06.2015 द्वारा स्वीकार कर लिया।

श्री भरत गांधी की केस में पारित राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आदेश दिनांक-3 मार्च 2015 पर डीजीपी. ने उ. प्र. के आरोपी मुख्यमंत्री के करीबी व इटावा के उप पुलिस अधीक्षक रह चुके िऋषिपाल यादव को जांच अधिकारी नियुक्त कर दिया। इस जांच अधिकारी ने जांच करने की बजाय आरोपी के आपराधिक सहयोगी की तरह जांच के नाम पर लीपापोती किया। यहां तक कि जबरदस्ती गवाही लेने के लिये हथियारबंद अपराधियों को लेकर गवाहों के घर पंहुच गया।

िऋषिपाल यादव को जांच अधिकारी नियुक्त होने के बाद व इस जांच अधिकारी के समक्ष गवाही देने के बाद शिकायतकर्ता प्रभात पाण्डेय का 27 अप्रैल को अमेठी से अपहरण हो गया। बंदूक की नोक पर सैकडों सादे पेपरों पर दस्तखत करवा लिये गये। अपहरणकर्ताओं का पता लगाने के लिये श्री भरत गांधी ने प्रदेश के मुख्य सचिव को 5 मई 2015 को प्रत्यावेदन देकर सीबीआई जांच या न्यायिक आयोग के गठन की मांग किया। मुख्य सचिव आलोक रंजन ने प्रदेश के गृह सविच को कार्यवाही का आदेश देते हुये मामला गृह सचिव देबाशीष पाण्डा के पास भेज दिया।

गत 20 मई 2015 को भरत गांधी ने प्रदेश के राज्यपाल राम नाइक से मिलकर पूरा वाकया बताया और सरकार से मामले में रपट मांगने की प्रार्थना किया। राज्यपाल की ओर से कोई कार्यवाही हुई या नही, इस विषय में राज भवन ने कोई जानकारी नही दिया। राज्यपाल राम नाइक जी की दवि ये है ि क वह गलत बात बर्दास्त नही करते। फिर भी राज्यपाल की चुप्पी यह बताती है कि राजव्यवस्था पूरी तरह सड़ गल चुकी है।

अपने लोकप्रिय प्रवचनों द्वारा कई हजार लोगं को राजनीतिक सुधार का प्रखर प्रवक्ता बना चुके श्री भरत गांधी कहते है कि कानूनी कार्यवाही का सामना करते-करते जब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव आजिज आ गये तो उन्होंने भरत गांधी का अपहरण करने के लिये टाटा सफारी व फार्चूनर गाड़ियों में अपराधियों को उनके लखनऊ निवास पर 4 जुलाई 2015 दोपहर 1 बजे भेजा। दिल्ली में होने के कारण भरत गांधी उनके हत्थे चढ़ने से बच गये। इस घटना पर पुलिस महानिदेशक के पास लिखित शिकायत की गई। पुलिस ने मुकदमा दर्ज नही किया। इसके बाद श्री गांधी ने प्रदेश के मुख्य सचिव को दिनांक 08 जुलाई 2015 को प्रत्यावेदन भेजकर अपने खिलाफ भेजे गये अपराधियों को पकड़ने व मुकदमा चलाने के लिये सी. बी. आई. तैनात करेन की मांग किया। प्रत्यावेदन की प्रतियों को कार्यवाही करने के लिये भारत सरकार के गृह सचिव, उ. प्र. के राज्यपाल और पुलिस महानिदेशक व दिल्ली के पुलिस कमिष्नर को भी भेजा गया। अपराधियों को पकड़ने की तो बात ही छोड़िये, कोई भी अधिकारी प्राथमिकी दर्ज करने की हिम्मत भी नही जुटा पाया।

इसका परिणाम यह हुआ कि अपराधियों का मनोबल और बढ़ गया। दो गाड़ियों में भरकर आये अपराधियों ने 31 जनवरी 2016 की रात में उस समय श्री भरत गांधी पर फिर से हमला किया, जब श्री भरत गांधी कन्नौज में आयोजित जनसभा को संबोधित करके अपनी कार से लखनऊ जा रहे थे। तमाम प्रत्यावेदनों के वावजूद फिर से आपराधियों के खिलाफ मुकदमा तक नही लिखा गया। भारत सरकार के मुख्य सचिव, उ. प्र. के राज्यपाल और पुलिस महानिदेशक सभी ने चुप्पी साध ली।

राजनीति शास्त्रा पर समकालीन चिंतक श्री भरत गांधी का कहना है कि चष्मदीद लोगों की नजरों के सामने कन्नौज में लगभग प्रदेश भर से बुलाकर 800 सशस्त्र अपराधियों को मुख्यमंत्री की पत्नी के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले लोगों का अपहरण करने के लिये लगाया गया था। सबने मोबाइल पर आपसे मे बात की थी। भरत गांधी ने अपहरणकर्ताओं के मास्टर माइण्ड नवाब सिंह यादव का मोबाइल नम्बर देते हुये तीन साल तक लगातार मांग किया कि कॉल रिकार्ड देखकर सभी 800 अपहर्ताओ को पकड़ा जाये। किन्तु आज तक किसी एजेन्सी ने काल रिकार्ड की परीक्षा नहीं की।

उ. प्र. के 800 अपराधियों को कौन बचा रहा है? क्या केन्द्र में सत्तासीन भाजपा सरकार सी बी. आई. लगाकर अपराधियों का जखीरा प्रदेश से उखाड़ नही सकती? आखिर सी बी. आई. लगाने की श्री भरत गांधी की बात को नकार के क्या केन्द्र की भाजपा सरकार प्रदेश की सपा सरकार के अपराधियों की सुरक्षा नहीं कर रही है? यदि ऐसा ही है तो क्या भाजपा चाहती है कि सपा का जंगलराज चलता रहे और जंगलराज का नाम लेकर भाजपा लोगों से हर पांच साल में जनता से वोट मांगती रहे।

मुख्यमंत्री पर अपराधों की साजिश रचने व अपराधियों को संरक्षण देने का जो आरोप लगा है, उस पर पुलिस थाने तो छोड़िये, स्वयं पुलिस महानिदेशक ने भी चुप्पी साध रखी है। अब तो आरोप स्वयं पुलिस महानिदेशक पर लगने लगे हैं। क्योंकि मानवाधिकर आयोग अपने आदेश दिनांक- 16.10.2015 द्वारा मांगे जाने पर भी पुलिस महानिदेशक ने श्री भरत गांधी की सुरक्षा पर तैयार किये गये जांच रपट को आयोग के अवलोकनार्थ नही भेजा और दो साल से छिपा कर रखा है। श्री भरत गांधी के लखनऊ आवास पर हमला करने वाली कार का नम्बर देने के बाद भी पुलिस महानिदेशक ने इस कार के मालिक का ब्योरा आयोग को नही भेजा। इसके विपरीत डिजिटल रजिस्टर से इस कार का पंजीकरण ही मिटा दिया गया। अमेठी के एडवोकेट प्रभात पाण्डेय व उनके लिये पैरबी करने वाले उनके पड़ोसी श्री लालजी वर्मा के खिलाफ रेप का झूठा मुकदमा पुलिस महानिदेशक और अखिलेश सरकार के मंत्री श्री गायत्री प्रजापति जो अब जेल में हैं, के निर्देष पर ही लिखवाया गया है।

पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव श्री भरत गांधी को जीवित छोड़ने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहते थे। उन्हांने श्री भरत गांधी का अपहरण व हत्या करने के इरादे से दो गाड़ियों में भरकर अपने पालतू अपराधियों को 7 जुलाई, 2015 को श्री भरत गांधी के लखनउ निवास पर भेजा। इस मामले में पुलिस में षिकायत दर्ज कराई गई, किन्तु मुकदमा नही लिखने दिया गया। इसके बाद 15 नवम्बर, 2016 को जब किसी तरह पता चला कि श्री भरत गांधी इस समय लखनउ में मौजूद हैं तो पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उनको उनके निवास से दोबारा अपहरण या हत्या का प्रयास करवाया। इस बार अपराधियों ने देखा कि मकान की छत पर बैठा कोई व्यक्ति कैमरे से संदिग्ध लोगों की गतिविधियों की रिकार्डिंग कर रहा है, खतरे को भांप कर अपराधी वापस चले गये।

मजेदार बात तो ये है कि उक्त सारी बातें श्री भरत गांधी ने अपनी बहस के दौरान सुप्रीम कोर्ट को गत 22 फरवरी, 2016 को अपनी दूसरी बहस के दौरान बताया और न्यायालय से केन्द्रीय बलों की सुरक्षा देने की मांग की। न्यायालय जो अक्सर राजनीति के अपराधीकरण पर टिप्पड़ियां करता रहता है, ने कहा कि तीन साल पुरानी याचिका पर फिर से अदालत कोई आदेश जारी नही कर सकती।

जब गवाहो के अपहरण, उनको डराने धमकाने व बंदूक की नोक पर बयान लेने श्री भरत गांधी की कार पर हमला करने की घटनाओं को माननीय राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के संज्ञान में लाया गया तो आयोग ने गत 24 फरवरी 2016 को दूसरा आदेश देते हुये श्री भरत गांधी के जीवन पर समाजवादी पार्टी के गुण्डों से खतरा महसूस किया और प्रमुख सचिव गृह श्री देवाशीश पाण्डा को आदेश देते हुये कहा कि शिकायतकर्ता श्री भरत गांधी को और लखनऊ में रह रहे उनके परिवारजन को पुलिस सुरक्षा दिया जाये साथ ही साथ अब मामले की जांच सी. आई. डी. से कराके आयोग को 6 सप्ताह के भीतर रिपोर्ट सौंपा जाये। जांच के लिये श्री भरत गांधी ने गवाहो के लिखित बयानों सहित आपराधिक घटनाओं का बिंदुवार ब्योरा अपने आवेदन दिनांक- 12 मार्च, 2016 और 11 अप्रैल, 2016 के आवेदनों के माध्यम से उत्तर प्रदेश की सी. आई. डी. को भेजा। किन्तु एक बार फिर कोई कार्यवाही नही होने दी गई।

अप्रैल, 2016 के बाद भेजे गये अपने आवेदनों के माध्यम से श्री भरत गांधी ने मानीय मानवाधिकार आयोग को बताया कि प्रदेश की अखिलेश सरकार ने आयोग के आदेश का उसी तरह उल्लंघन कर दिया है जिस तरह अखिलेश सरकार ने माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन सन् 2013 में किया था। श्री भरत गांधी की बातों को सही बताते हुये सी. आई. डी. उत्तर प्रदेश ने आयोग को भेजे गए अपने 9 सितम्बर, 2016 के पत्र में कहा है कि माननीय राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जांच करने संबंधी आदेश सी. आई. डी. को प्राप्त हुए हैं और प्रदेश के प्रमुख सचिव गृह से जांच करने की अनुमति चार बार मांगी गई किंतु जांच की अनुमति सरकार ने नहीं दी।

श्री भरत गांधी और सी. आई. डी. उत्तर प्रदेश के पत्रों पर संज्ञान लेते हुये माननीय आयोग ने अपने नए आदेश अप्रैल, 2017 में प्रदेश के प्रमुख गृह सचिव श्री देवाशीश पांडा को सम्मन भेजा है। अब गृह सचिव को श्री भरत गांधी की केस में पारित गत आदेश 24 फरवरी 2016 का अनुपालन करने के तहत श्री भरत गांधी को पुलिस सुरक्षा मुहैया कराना होगा; सी. आई. डी. को जांच करने की अनुमति देनी होगी और जांच की रिपोर्ट 6 सप्ताह के भीतर आयोग को भेजना होगा। यदि गृह सचिव फिर से अखिलेश यादव और उनके आपराधिक गिरोह को बचाने की कोशिश करते हैं और आयोग के आदेश का अनुपालन करने में हीलाहवाली करते हैं तो आयोग की प्रक्रिया के तहत आयोग अपने अगले आदेश में प्रदेश के प्रमुख सचिव गृह को गिरफ्तार करके आयोग के समक्ष पेश करने के लिए वारंट जारी करेगा।

किन्तु वारंट की नौबत आती हुई नही दिख रही है क्योंकि अब प्रदेश में सरकार बदल चुकी है। नये मुख्यमंत्री प्रदेश में अपराधियों की सफाई का अभियान चला रहे हैं। वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल (वीपीआई) के मुखिया श्री भरत गांधी के केस में पारित माननीय राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का आदेश मुख्यमंत्री के अपराध निवारण के काम में सहयोगी ही साबित होगा, क्योंकि इससे समाजवादी पार्टी के प्रदेश भर के लगभग 800 अपराधियों के पकडे़ जाने की संभावना है।

श्री अखिलेश यादव पर यह मुकदमा जाने-माने राजनीति सुधारक व दर्जनों पुस्तकों के लेखक व वोटर्स पार्टी इंटरनेशनल के मुखिया श्री भरत गांधी ने राजनीति से अपराध खत्म करने की अपनी मुहिम के तहत दायर किया है। इसके पहले उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में भी मुकदमा किया है उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में इसी मामले में दो बार बहस भी कर चुके हैं। आयोग के गत आदेश दिनांक- 24.02.2016 और इसी के अनुपालन के लिये जारी ताजा आदेश 05.04.2017 की संलग्न। प्रति विस्तृत जानकारी- अवजमतेचंतजलण्पदधंददंनरापकदंचांदक

सवाल उठता है कि आखिर उच्च स्तरीय लोगों के अपराधों पर कानून की सारी मषीनरी हैंग क्यों हो जाती है? इसकी वजह क्या है? इसके लिये जिम्मेदार कौन है? क्या हाई कोर्ट, जिसने चस्मदीद गवाहों को अदालत तक पंहुंचने नही दिया और चुनाव याचिका रद्द कर दी? क्या सुप्रीम कोर्ट, जिसने बिना कारण बताये सी. बी. आई. जांच कराने से मना कर दिया और राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिये संघर्षरत श्री भरत गांधी को पुलिस सुरक्षा देने के बारे में जानबूझ कर लचर भाषा का इस्तेमाल किया, जिससे पुलिस महानिदेशक उस भाषा का दुरुपयोग करके भरत गांधी पर जान के खतरे का भय बनाये रख सकें? क्या संघीय गृह मंत्रालय के अधिकारी, जिन्होने रामदेव, शीजलवाड़, संगीत सोम, पप्पू यादव को तो सुरक्षा दे दिया, लेकिन श्री भरत गांधी के मामले को बार-बार उत्तर प्रदेश के उसी दफ्तर में भेजा, जिनकी वजह से श्री गांधी की जान को खतरा पैदा हुआ? क्या उत्तर प्रदेश के मुख्य सूचना आयुक्त श्री जावेद उस्मानी, जिन्होंने अपना फैसला देते वक्त पुलिस महानिदेशक के उस गैर कानूनी आदेश पर चुप्पी साध लिया जिसमें श्री भरत गांधी को पुलिस महानिदेशक ने उनकी अपनी सुरक्षा पर किये गये जांच रिपोर्ट को देने से मना कर दिया था।

उच्च स्तरीय लोगों के अपराधों पर कानून की सारी मषीनरी हैंग क्यों हो जाती है व राजनीति के क्षेत्र का अपराध रुकता क्यों नही? आखिर इसके लिये जिम्मेदार कौन है? क्या अपराध की सीढ़ी पर चढ़कर सत्ता के षिखर पर विराजमान नेता, जो पालतू अपराधियों द्वारा अपराध करवाते हैं, पुलिस महानिदेशक से उन अपराधियों को संरक्षण दिलवाते हैं और राजनीतिक अपराधियों के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने वालों के खिलाफ झूठे मुकदमें लिखवाकर उन्हें जेल भेजवाते है? क्या भारत का चुनाव आयेग, जो सब कुछ जानते हुये भी मुख्यमंत्री की पत्नी श्रीमती डिम्पल यादव को अपराध के सहारे निर्विरोध सांसद बनने का केवल मौका ही नहीं दिया, अपितु कन्नौज से निर्विरोध चुनाव जीतने का झूठा प्रमाणपत्र देने वाले जिला अधिकारी का बचाव भी करता रहा। क्या कानून, जो पुलिस को प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री के अधीन रखते हैं?

कन्नौज अपहरण काण्ड और उसके खिलाफ लड़ी गई कानूनी जंग से साफ पता चलता है कि राजनीति के अपराध के लिये केवल नेता जिम्मेदार नही हैं। देश-प्रदेश के गृह मंत्रालयों के आई. ए. एस. व आई. पी. एस. अधिकारी, प्रदेशों के पुलिय महानिदेशकों के कार्यालय, चुनाव आयोग, हाई कोर्ट व सुप्रीम कोर्ट भी उतने ही जिम्मेदार हैं। इससे आगे बढ़कर अपनी जान हथेली पर लेकर अपराध के खिलाफ संघर्ष कर रहे श्री भरत गांधी राजनीति के अपराधीकरण के लिये उक्त संस्थाओं के अलावा जनप्रतिनिधित्व कानून व लोकतंत्र की वर्तमान परिभाषा को भी जिम्म्ेदार मानते हैं और अपराध के खिलाफ एक बड़ी मुहिम छेड़ने की जरूरत बताते हैं। उनका यह भी कहना है कि चूंकि मीडिया की नई तकनीकि आ जाने के कारण किसी भी तरह की मुहिम अब केवल कारपोरेट संचालित मीडिया ही चला सकती है। अतः यदि अपराध के खिलाफ देश में कोई मुहिम नहीं चल रही है तो इसका सीधा सा अर्थ है कि देश विदेश के कारपोरेट घराने राजनीति के अपराधीकरण को अपनी आमदनी का जरिया समझते हैं।

फिलहॉल, संवैधानिक एजेन्सियों द्वारा की जा रही अपहर्ताओं की सुरक्षा से संदेश. जाता है कि राजनीति का अपराधी सुरक्षित है। राजनीति केवल अपराधियों के लिये है। जो अपराध नही कर सकता, वह चुनाव लड़ नही सकता। चुनाव में दूसरी पार्टियों के अपराधियों का सामना किसी भी पार्टी का सज्जन कार्यकर्ता नहीं कर सकता है? इसलिये पार्टियों के सामने अपराधियों को ही टिकट देने के सिवा कोई विकल्प नही है। इस परिस्थिति को तभी बदला जा सकता है जब राजनीति के अपराधीरिण के खिलाफ केवल बोला ही न जाय, अपितु कुछ किया भी जाये। कम से कम श्री भरत गांधी जैसे लोग कुछ कर रहे हैं तो उनका हर संभव सहयोग किया जाये। चुप्पी केवल भरत गांधी के लिये ही नही, सबके लिये घातक है।

रिपोर्टर- जयपाल जेहरा, पीयूसीएल, दिल्ली,

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वोटर्स पार्टी इंटरनेशनल

प्रादेशिक कार्यालय: 6/1067, जानकीपुरम एक्स्टेंषन, लखनऊ

  दिनांक: 10 अगस्त 2017

प्रेस विज्ञप्ति

कन्नौज अपहरण काण्ड में मानवाधिकार आयोग ने मामले को फुल बेंच को भेजा

उ. प्र. के पूर्व मुख्यमंत्री श्री अखिलेष यादव द्वारा प्रायोजित कन्नौज अपहरण काण्ड में श्री भरत गांधी को पुलिस सुरक्षा नहीं देने से राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग क्षुब्ध

लखनऊ, 10 अगस्त 2017: कन्नौज अपहरण कांड में समाजवादी पार्टी के प्रभावशाली अपराधियों को दंडित करने के लिए सन 2012 से लगातार कानूनी कार्यवाही कर रहे भरत गांधी को पुलिस सुरक्षा न दिए जाने से राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग क्षुब्ध हो गया है और उसने अब श्री भरत गांधी के केस की सुनवाई एकल पीठ से स्थानांतरित करके आयोग की पूर्ण पीठ को सौंप दी है। श्री भरत गांधी ने लखनऊ में मीडिया से मुखातिब होकर यह जानकारी दी।श्री गांधी गांधी भवन, लखनऊ में पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा प्रायोजित कन्नौज अपहरण काण्ड मे चल रही मीडिया रिपोर्टिग में तथ्यात्मक त्रुटियों को संशोधित करने व मीडिया को सही तथ्यों से परिचित कराने के उद्देश्य से आयोजित प्रेस वार्ता में मीडिया से बात कर रहे थे। श्री गांधी ने बताया कि वे 2012 से लगातार कन्नौज अपहरण काण्ड में कार्यवाही कर रहे हैं और उन पर कई बार हमले हो चुके हैं। मानवाधिकर आयोग श्री भरत गांधी को पुलिस सुरक्षा देने के लिए सन 2014 से लेकर अब तक कई आदेश जारी कर चुका है, लेकिन अखिलेश सरकार ने किसी भी आदेश का अनुपालन नहीं किया। अब योगी सरकार आने पर अनुपालन शुरू हुआ किंतु पुलिस सुरक्षा अभी तक नहीं दी गई है। हालांकि प्रदेश के गृह ने सचिव भरत गांधी को पुलिस सुरक्षा देने का आदेश गत 19 अप्रैल को ही दिया था, लेकिन उस आदेश का अनुपालन भी अभी तक नहीं हुआ है। 19 अप्रैल को उसी दिन आयोग ने मामले की सुनवाई के लिए श्री गांधी के मामले की फाइल आयोग की पूर्ण पीठ को भेज दी और प्रदेश सरकार को आदेशित किया है कि श्री गांधी के मामले की जांच उत्तर प्रदेष की सीबीसीआईडी से करवाके आयोग को रिपोर्ट सौंपी जाय और श्री गांधी को अविलम्ब पुलिस सुरक्षा दी जाए।श्री गांधी धर्म, अध्यात्म, उद्विकास विज्ञान, नई अर्थव्यवस्था और नई राज्यव्यवस्था पर दर्जनों पुस्तकें लिख चुके हैं व भारत के संविधान में संशोधन प्रस्ताव तैयार करके सन 2000 में राष्ट्रपति को सौंप चुके हैं। राजनीतिक व्यवस्था को सुधारने संबंधी उनका एक प्रस्ताव भारत की संसद में 137 सांसद सन 2005 में प्रस्तुत कर चुके हैं। वर्तमान में श्री गांधी राजनीतिक सुधार के लिए कार्यरत हैं और वोटर्स पार्टी इंटरनेशनल के प्रमुख हैं। इस पार्टी के संविधान में पार्टी के प्रमुख को नीति निर्देशक कहा जाता है। आरोप है कि इसी पार्टी के प्रत्याशी प्रभात पांडे और पार्टी के नेता सादेश यादव और राम सिंह लोधी व नामांकन के प्रयासरत अन्य प्रत्याषियों का अपहरण 6 जून 2012 को तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जी की पत्नी श्रीमती डिंपल यादव के उपचुनाव के दौरान करा लिया गया था। किसी को नामांकन पत्र नहीं भरने दिया गया था और डिंपल यादव को निर्विरोध सांसद घोषित कर दिया गया था। वोटर्स पार्टी इंटरनेशनल ने हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में वाद दाखिल किया और इस मुद्दे पर लगातार संघर्ष करती रही है। किंतु अखिलेश सरकार ने अदालती आदेशों का अनुपालन नहीं किया। इसीलिए माननीय राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने क्षुब्ध होकर मामले को 24 फरवरी 2016 को प्रदेश की सीबीसीआईडी को दे दिया। मामला सीबीसीआईडी तक 24 फरवरी 2016 में इसलिए पहुंचा, क्योंकि वीपीआई प्रमुख भरत गांधी पर 3 बार हुए हमलों के बावजूद भी अखिलेश सरकार ने श्री गांधी  को पुलिस सुरक्षा मंजूर नहीं की। मानवाधिकार आयोग केवल मानवाधिकारों के हनन संबंधी मामले पर ही विचार करता है, इसलिए यदि श्री गांधी को पुलिस सुरक्षा दे दी जाती तो मानवाधिकार आयोग से श्री गांधी की याचिका 2014 में ही निस्तारित हो जाती। अपराधिक मामलों की सुनवाई का अधिकार न्यायालयों को है। किंतु जब पुलिस ने काम करना बंद कर दिया और पुलिस के गलत कार्यों के सबूत माननीय आयोग के समक्ष श्री गांधी ने प्रस्तुत किये, तब आयोग ने सीबीसीआईडी जांच का निर्देश उत्तर प्रदेश के गृह सचिव को 24 फरवरी 2016 को दिया और अब जब पूरे एक साल तक भी आयोग के आदेश का अनुपालन नहीं हुआ और श्री गांधी को पुलिस सुरक्षा नहीं दी गयी, तो मानवाधिकार आयोग ने क्षुब्ध होकर अपने नवीनतम आदेश 19 अप्रैल 2017 में मामले को एकल पीठ से स्थानान्तरित करके आयोग की पूर्ण पीठ को सुनवाई के लिए भेज दिया है। इससे कन्नौज अपहरण काण्ड के अभियुक्तों की मुश्किलें और बढ़ गयी हैं। कन्नौज अपहरण कांड में लगभग 800 लोगों पर सैकड़ों लोगों का अपहरण करने का आरोप है। मानवाधिकार आयोग की वेबसाइट www.nhrc.nic.in पर भरत गांधी की केस संख्या 40582/24/48/2013 द्वारा आयोग के नवीनतम आदेश 19.04.2017 को देखा जा सकता है।हिंदी और अंग्रेजी में कन्नौज अपहरण कांड के पूरे घटनाक्रम को जानने के लिए वीपीआई वेबसाइट का यह लिंक देखें- http://votersparty.in/kannauj-kidnap-case-history/ कन्नौज अपहरण कांड से संबंधित मीडिया में समाचार आते रहे हैं किंतु रिपोर्टिंग में कुछ तथ्यात्मक त्रुटियां देखने को मिली है। इन त्रुटियों के साथ उनका संशोधित तथ्य का विवरण इस विज्ञप्ति के साथ संलग्न 1 के रूप में  संलग्न है।राजनीति के अपराधीकरण को दूर करने के लिए किए गए श्री भरत गांधी के संघर्षों का इतिहास इस विज्ञप्ति के साथ संलग्नक 2 के रूप में संलग्न है। भरत गांधी की सुरक्षा पर खतरे के संबंध में पुलिस को सौंपी गई रिपोर्ट हिंदी में देखने के लिए यह लिंक क्लिक करें http://votersparty.in/bharat-gandhi-2/

(हुकुम सिंह)

प्रदेश अध्यक्ष, वीपीआई

वोटर्स पार्टी इंटरनेशनल

प्रेस वक्तव्य
वोटरशिप कानून बने बिना गरीबी नहीं जायेगी – भरत गांधी
वीपीआई प्रमुख ने कहा कि देश में भ्रष्टाचार की समस्या गंभीर। जब तक उत्तराधिकार का सीमांकन का कानून नहीं बनता, तब तक देश से भ्रष्टाचार नहीं जाएगा।
लखनऊ, 10 अगस्त 2017: देश में गरीबी और भ्रष्टाचार बहुत गंभीर समस्या बन गये हैं। जब तक देश में उत्तराधिकार का सीमांकन का कानून नहीं बनता, तब तक भ्रष्टाचार समाप्त नहीं होगा और जब तक वोटरषिप कानून नहीं बनता, तब तक देश से गरीबी दूर नहीं होगी। यह बात गांधी भवन, लखनउ में आयोजित ‘वोटरशिप और सुशासन के लिए जरूरी कानूनी सुधार’ विषय पर व्याख्यान देते हुए श्री भरत गांधी ने कही।
इस बारे में विस्तार से समझाते हुए श्री भरत गांधी ने कहा कि वोटरशिप कानून बनाकर मशीनों से पैदा हो रहे धन को जब तक देश के वोटरों में बेशर्त नहीं बांटा जाता, तब तक गरीबी किसी सूरत नहीं जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि भ्रष्टाचार का मूल कारण सीमाहीन उत्तराधिकार कानून है। जब तक उत्तराधिकार कानून की सीमा नहीं बनती, तब तक भ्रष्टाचार नहीं जा सकता। उत्तर प्रदेश के राजनीति सुधारकों और बुद्धिजीवियों के प्रषिक्षण कार्यक्रम में व्याख्यान देते हुए श्री भरत गांधी ने पूछा कि क्या उत्तराधिकार की कोई सीमा नहीं बननी चाहिए? खरबपतियों के बच्चे बिना कुछ किए धरे और बिना किसी परीक्षा के केवल कानून की ताकत से खरबपति बना दिए जाने चाहिए? श्री गांधी ने असीमिति उत्तराधिकार कानून के दुष्परिणाम पर प्रकाश डालते हुए आगे कहा कि संसार में कुछ भी नहीं है जिसकी सीमा न हो, लेकिन उत्तराधिकार है, जिसकी कोई सीमा नहीं है। आप जिंदगी में लूटमार करके कुछ भी कमा लीजिए, यहां तक कि पूरा देश का मालिकाना हासिल कर लीजिए, तो दोषी उत्तराधिकार कानून से वह आपके बच्चों को बिना मेहनत किये और बिना कोई परीक्षा दिये मिल जायेगा।’
नई अर्थव्यवस्था और नई राजव्यवस्था पर दर्जनों पुस्तकों के लेखक और जाने-माने राजनीति सुधारक श्री भरत गांधी ने बताया कि जापान में 80 प्रतिशत उत्तराधिकार की संपत्ति व्यक्ति की मृत्यु के बाद राष्ट्र को चली जाती है। इसलिए जापान छोटा सा देश है लेकिन दुनिया का ताकतवर बना। चीन तो आगे गया ही इसलिए कि वह उत्तराधिकार को नहीं मानता। लेकिन भारत जैसे बड़े देश में उत्तराधिकार की कोई सीमा नहीं है। यही सीमाहीन उत्तराधिकार कानून समस्याओं की जड़ है। इसी कानून से गरीबी है, इसी कानून से बेरोजगारी है, इसी कानून से विषमता है, इसी कानून से भ्रष्टाचार है, इसी कानून से असुरक्षा है और इसी कानून से सभ्यता, संस्कृति और राष्ट्र को खतरा है। श्री गांधी ने इस विषय में कारणें को स्पष्ट करते हुए कहा कि अधिकारी, नेता, सरकारी कर्मचारी, सब में लूटमार की होड़ मची है, क्योंकि वे जानते हैं कि यही पैसा मृत्यु के बाद आगे बच्चों को जाएगा। ईमानदारी से कुछ करोगे तो तुम्हारे बच्चे सड़कों पर दिखाई देंगे। बाप ईमानदार डॉक्टर है तो उत्तराधिकार में बेटे को डॉक्टर की डिग्री नहीं मिलेगी। बाप ईमानदार अधिकारी है तो बेटे को उत्तराधिकार में आईएएस और पीसीएस की डिग्री नहीं मिलेगी। बाप ईमानदार एमपी, एमएलए और मंत्री है, तो बेटे को उत्तराधिकार में सांसद विधायक और मंत्री नहीं बनाया जाएगा। उसको चुनाव लड़ना पड़ेगा और जीतना पड़ेगा। इसीलिए ईमानदारी केवल अनपढ़ लोगों पाई जाती है। ज्यादातर पढ़ा लिखा आदमी कानून की यह साजिश समझ जाता है और बेईमान हो जाता है। श्री गांधी ने देश की गम्भीर समस्याओं का विश्लेषण करते हुए कहा कि उत्तराधिकार कानून भ्रष्टाचार की गंगोत्री है। यदि कोई व्यक्ति गरीबी, बेरोजगारी, विषमता, भ्रष्टाचार, सभ्यता, संस्कृति और राष्ट्र के लिए लड़ता दिखाई पड़े, लेकिन उत्तराधिकार का समर्थन करे, तो समझिए कि उसकी लड़ाई झूठी है। इसीलिए जब तक उत्तराधिकार पर कोई सीमा नहीं बनती, देश में भ्रष्टाचार खत्म नहीं किया जा सकता। यदि उत्तराधिकार का सीमांकन का कानून बन जाता है, तो सरकार को इतना पैसा मिल जायेगा कि देश के वोटरों को वोटरषिप कानून के तहत बड़ी रकम दी जा सकती है।
प्रषिक्षण व्याख्याान में श्री गांधी ने बेरोजगारी आतंकवाद, विषमता, अपराध, विष्व शांति और विष्व सुरक्षा इत्यादि विषयों पर भी प्रकाश डाला और इन चुनौतियों से निपटने के लिए आवष्यक कानूनी सुधारों के बारे में लोगों को बताया। प्रशिक्षण कार्यक्रम में लखनउ, उन्नाव, कानपुर, कन्नौज, औरैया, फर्रूखाबाद, इटावा, एटा, अलीगढ़ और कानपुर देहात के बुद्धिजीवियों ने भाग लिया। कार्यक्रम का आयोजन श्री भरत गांधी के विचारों को कार्यरूप देने के लिए कार्यरत भरत गांधी फाउण्डेशन ने किया। प्रशिक्षण कार्यक्रम में कुछ विषयों पर वोटर्स पार्टी इंटरनेशनल के दलित मोर्चा के संयोजक श्री एम. एस. अम्बाड़ी , वीपी आई प्रदेश अध्यक्ष श्री हुकुम सिंह, श्री सादेश यादव ने भी अपने विचार व्यक्त किये। नवीन कुमार ने धन्यवाद ज्ञापन दिया।

प्रेस वक्तव्य

 

22 अगस्त 2017

व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई भरत गांधी के साथ मिलकर लड़ेंगे लोकतंत्र सेनानी

 

लखनऊ, 22 अगस्त: आपातकाल में जेल जाने वाले लोकतंत्र सेनानी अब देश में भरत गांधी के साथ मिलकर राजनीति सुधारने का काम करेंगे। श्री गांधी ने देश के अनुकूल वैकल्पिक राजव्यवस्था व अर्थव्यवस्था का स्वदेशी ढांचा तैयार किया है। इन विषयों पर चार दर्जन से ज्यादा किताबें लिखी है और गत 25 सालों से ये काम करते रहे हैं। उनके कुछ प्रस्तावों को सौ से ज्यादा सांसदों ने संसद में भी प्रस्तुत किया है। गांधी भवन, लखनऊ में आयोजित एक दिवसीय विचार गोष्ठी में श्री भरत गांधी के नेतृत्व में लोकतंत्र सेनानियों ने भरत गांधी के साथ मिलकर राजनीति सुधारो अभियान में सक्रिय भूमिका निभाने का फैसला किया। श्री भरत गांधी लोकतंत्र सेनानियों को राजनीति सुधार के सूत्रों पर व्याख्यान देने लखनऊ आये थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता जाने-माने संविधान विशेषज्ञ व लोकसभा के पूर्व महासचिव डॉ. सुभाष कश्यप ने की।  उद्घाटन संबोधन में लोकतंत्र सेनानी कल्याण परिषद के राष्ट्रीय महासचिव चतुर्भुज त्रिपाठी ने कहा कि मध्यप्रदेश सरकार ने किसानों के आंदोलन को दबाने के लिये 1 जुलाई, 2017 के शाननादेश से जिलाधिकारियों को किसी के ऊपर भी राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, रासुका लगाकर जेल भेजने का अधिकार दे दिया है। ये खबर मीडिया से गायब है। श्री त्रिपाठी ने कहा कि वर्तमान हालात आपातकाल से भी बुरे हैं। उन्होंने हॉल में आत्महत्या कर गये अरूणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री कलिखो पुल के 62 पृष्ठों के आत्महत्या नोट के तथ्यों से लोगों को परिचित कराते हुये कहा कि वर्तमान व्यवस्था पूरी तरह सड़ चुकी है। उन्होंने कहा कि देश को इस हालत से भरत गांधी जैसा वैचारिक क्रांतिदूत ही बचा सकता है। श्री त्रिपाठी ने कहा कि मै श्री भरत गांधी के राजनीतिक व आर्थिक विचारों से बहुत प्रभावित हूँ और हमने फैसला किया है कि हम लोकतंत्र सेनानी उनके साथ कमर कसकर एक बार फिर उसी तरह खड़े होगे जैसे जयप्रकाश जी के साथ हम प्रथम आपातकाल के खिलाफ लड़े थे।

गांधी भवन, लखनऊ में भरत गांधी फाउण्डेशन एवं लोकतंत्र सेनानी कल्याण परिषद के संयुक्त तत्वाधान में एकदिवसीय गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसका विषय था-‘राजनीति सुधारों आन्दोलन में लोकतंत्र सेनानियों की भूमिका’। इस गोष्ठी में अध्यक्षीय संबोधन करते हुये जाने-माने संविधान विशेषज्ञ व लोकसभा के पूर्व महासचिव डॉ. सुभाष कश्यप ने कहा कि चुनाव सुधार के बिना इस देश में किसी सुधार की कल्पना नही की जा सकती। उन्होंने कहा कि ऐसे कानून बनाया जाना आवश्यक है जिससे किसी भी चुनाव में आधे से ज्यादा वोट पाना अनिवार्य हो जाय।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रख्यात राजनीतिक विचारक श्री भरत गांधी ने लोकतंत्र सेनानियों को राजनीति सुधार के 25 सूत्रों से परिचित कराया। उन्होंने कहा कि आधुनिकता के नाम पर पश्चिमी सोंच से और संस्कृतिप्रेम के नाम पर इतिहासग्रस्तता से हमें उबरना पड़ेगा। श्री गांधी ने कहा कि कि नेताओं,  अधिकारियों, व्यापारियों व मीडिया को गाली देना तब तक व्यर्थ है, जब तक वैकल्पिक राजव्यवस्था व अर्थव्यवस्था का कोई मॉडल सामने न हो। उन्होंने कहा कि आज की व्यवस्था कूबड़ वाले ऊंट जैसी है। इस ऊंट पर जो भी बैठेगा, उसे कमर हिलाना ही पड़ेगा और जो लोग कभी ऊंट पर नहीं बैठे हैं, उनसे गालियां सुनना ही पड़ेगा, क्योंकि वे कमर हिलने की असली वजह नहीं जानते।

गोष्ठी में बोलते हुए श्री गांधी ने कहा, ‘देश में आपातकाल लगा, तो लोकतंत्र सेनानियों ने अपनी जान की बाजी लगाकर मुकाबला किया। उन्होंने अपना परिवार खोया, अपनी जवानी खोयी, काम-धन्धा खोया, खेती-बाड़ी खोयी, अपना स्वास्थ्य खोया और कईयों को तो अपनी जान गंवानी पड़ी। उस समय मीडिया ने कुछ ऐसा माहौल बना दिया था कि इंदिरा को सत्ता से हटाया जायेगा, तो एक नये राष्ट्र का निर्माण होगा, जिसमें गरीबी, बेरोजगारी, विषमता, भ्रष्टाचार, अपराध, गुण्डागर्दी, सांस्कृतिक पतन आदि कुछ नहीं होगा। लेकिन यह सपना बहुत जल्द उसी तरह चकनाचूर हो गया, जैसे हमारे स्वतंत्रता सेनानियों का आजाद भारत का चकनाचूर हुआ था। इंदिरा गांधी को हटाने वाली जनता पार्टी तहस-नहस हो गयी। कांगे्रस दोबारा से आ गयी। इसके बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ 1987 में वी.पी.सिंह जी आये। लेकिन हालात जस के तस रहे। उन्होंने सपना दिखाया कि पिछड़े और दलित सत्ता संभाल लें व ओ.बी.सी को आरक्षण मिल जाये, तो सब ठीक हो जायेगा। पिछड़े और दलितों को सत्ता मिली भी। लेकिन कुछ हुआ नहीं। मुट्ठी भर लोगों को अमीरी मिल गयी, बाकी लोग जहां के तहां रह गये। उसके बाद नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह की जोड़ी यह कहकर आयी कि दूसरे देश के लोगों को अपने देश में धंधा-बिजनेस करने की छूट दे देंगे, तो देश में चारों तरफ पैसा ही पैसा हो जायेगा, मगर ऐसा नहीं हुआ। बाजपेयी जी स्वदेशी के सपने के साथ आये। लेकिन 24% विदेशी निवेश का कानून बनाकर देश के मीडिया को ही विदेशों को गिरवी रखकर चले गये। अन्ना हजारे और उनकी टीम के लोग भ्रष्टाचार रोकने आये थे, लेकिन उनकी टीम भ्रष्टाचार में लिप्त हो गयी। हिन्दू राज का सपना दिखाकर मोदीजी आये। लेकिन हिन्दूवाद और राष्ट्रवाद के नाम पर देशी-विदेशी खरबपति पूरे देश को अजगर की तरह निगल रहे हैं। भाजपा के पुराने सिद्धांत और पुराने नेता, दोनों को दफन कर दिया है। लोगों में भारी असंतोष है। लेकिन लोगों के असंतोष के सुर में मीडिया सुर मिलाने को तैयार नहीं है। एक बार फिर आपातकाल जैसी स्थिति पैदा हो गयी है। इस बार आपातकाल मीडिया पर नहीं लगा है, खरबपतियों ने मीडिया के सहारे आम जनता पर लगाया है।

भारत की राजव्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन करने के लिए श्री भरत गांधी 2002 से राजनीति सुधार के कार्यक्रम चला रहे हैं। भारत की संसद के लगभग 400 सांसदों को वे राजनीतिक सुधारों के बारे में व्याख्यान दे चुके हैं,  उन्हें समझा चुके हैं और 137 सांसद उनके सुधारों पर संसद में कानून बनाने के लिए प्रस्ताव भी पेश कर चुके हैं। नागरिकों और देशों की राजनीतिक और आर्थिक आजादी के लिए अन्तर्राष्ट्रीय संधि का मसौदा तैयार किया है व दुनिया के 198 देशों के राष्ट्राध्यक्षों के समक्ष स्वीकार करने हेतु रखा है। अविवाहित रहकर एक त्यागी-तपस्वी का जीवन जीने वाले श्री भरत गांधी व्यवस्था परिवर्तन करने के लिए ‘राजनीति सुधारो अभियान’ चला रहे है, तथा देश भर में राजनीति सुधारकों को प्रशिक्षित करने के लिए व्याख्यान देते हैं। संसद में सैकड़ो सांसदों के समर्थन के बाद भी जब उनके प्रस्ताव पर सामाजिक सुरक्षा के लिये कानून नहीं बना तो उनके समर्थकों ने सन् 2012 में एक नई राजनीतिक पार्टी बना लिया, जिसके श्री भरत गांधी नीति निर्देशक हैं। यह पार्टी कन्नौज अपहरण काण्ड में कानूनी कार्यवाही करने के कारण आजकल चर्चा में है।

गोष्ठी में लोकतंत्र सेनानी संगठन के श्री गिरीश सक्सेना, पी. के. त्रिपाठी, माता प्रसाद तिवारी, सोवरन सिंह कुशवाहा, राम स्वरूप लोधी, राम शंकर गुप्ता आदि सेनानियों ने और वोटर्स पार्टी इण्टरनेशनल के प्रदेश अध्यक्ष हुकूम सिंह, सादेश अली मशीह व सुरेन्द्र प्रधान भी अपने विचार रखें।

भवदीय

 

 

 

(पी. के . त्रिपाठी)

लोकतंत्र सेनानी कल्याण परिषद के उपाघ्यक्ष व

महासचिव- कार्यक्रम आयोजक/स्वागत समिति

9415736147, 7991668888,

भरत गांधी फाउण्डेशन कार्यालय-96 96 1 2 3 4 5 6

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